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Editorial by Tridib Raman

राफेल मामले में सरकार का बचाव अब ठोस सबूतों से ही हो सकता है जुमलों से नहीं

खरीद प्रक्रिया में अब जब जिस फ्रास्वा ओलांद के समय में यह करार हुआ है वही कह रही है कि कंपनी का नाम सरकार ने सुझाया तो आखिर दसां के पास चयन का विकल्प ही कहां रह गया था। फिर सरकार अगर दो चार नाम सुझाती तो दसां उनमें से कोई एक चुन लेती


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फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के खुलासे के बाद और राफेल विमान बनने वाली कंपनी दसां के लीपापोती के बावजूद अब इस बात की आशंका बढ़ने लगी है कि राफेल सौदा एक भारी-भरकम घोटाला साबित हो सकता है।

इस नये खुलासे के बाद यह साफ हो जाता है कि सरकार जिस तरह विपक्ष के दावों और आरोपों को दरकिनार कर एक सहज सरल सौदे की बात कर रही थी वैसा नहीं था। इस मामले में कई पेचोखम थे। सरकार कुछ बातें करार के नियमों की आड़ में छिपा रही थी। इनके खुलने के बाद बहुतेरे विस्फोटक राज बाहर आ सकते हैं।

सरकार का यह कहना कि यह दो कंपनियों के बीच समझौता या सौदा था, इसमें सरकार का कोई हाथ नहीं था। इसलिये इसमें सरकार को घसीटना या उसके ऊपर आरोप प्रत्यारोप व्यर्थ है। सच तो यह है कि यह कथन बेहद बचकाना और हास्यास्पद, व्यावहारिकता और वास्तविकत से परे है।

फ्रांस्वा ओलांद का यह कहना कि रिलायंस का नाम भारतीय सरकार ने ही सुझाया था और इसके लिये उनको कोई विकल्प ही नहीं दिया गया था।

जाहिर है सरकार एक तरह से वास्तविक हकदार हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को दरकिनार कर ऐसा रास्ता बना रही थी कि भले ही रिलायंस को कोई अनुभव न हो, वह आपेक्षित मानकों को पूरा करे या नहीं पर दसां को उसी के साथ काम करना पड़े।

भले ही दसां को खरीद प्रक्रिया में यह छूट प्रदान थी कि वह किसी भी भारतीय कंपनी को ऑफसेट प्रोजेक्ट में अपना साझीदार बनाने के लिये चुने, फिर सरकार के पास उसका नाम भेजे और स्थानीय साझीदार के लिये उसकी पुष्टि सरकार से करा सके। पर नये प्रकरण से स्पष्ट होता है कि खरीद प्रक्रिया में इसका भौंडा स्वांग किया गया।

खरीद प्रक्रिया में अब जब जिस फ्रास्वा ओलांद के समय में यह करार हुआ है वही कह रही है कि कंपनी का नाम सरकार ने सुझाया तो आखिर दसां के पास चयन का विकल्प ही कहां रह गया था। फिर सरकार अगर दो चार नाम सुझाती तो दसां उनमें से कोई एक चुन लेती।

सरकारी नुमाइंदे यह कर सकते थे कि वे रिलांस के साथ बाकी कंपनियां ऐसी चुनती जिनकी प्रोफाइल दूर दूर तक इस लायक नहीं होती कि उन्हें किसी खास के मुकाबिल चुना जा सकता, पर सरकार यह करने में सक्षम नहीं हो सकती थी क्योंकि जिस रिलायंस का विकल्प उसने दसां को सौंपा था, उसका निर्माण ही हुये जुम्मा-जुम्मा कुछ दिन हुये थे।

ऐसे में अगर सरकार सौदे और बातचीत में पारदर्शिता लाने की कोशिश करती और रिलांयंस के विकल्प के तौर पर कोई भी स्थापित कंपनी या फिर नयी बनी कंपनी भी खड़ी करती, तो दसां रिलायंस को न चुनती या इसकी संभावना न्यून हो जाती और सरकार का की योजना धरी की धरी रह जाती।

रक्षा मंत्री ने अपने एक बयान में कहा कि एचएएल विमान निर्माण या इस तरह के ऑफसेट के लिये पूर्णतया सक्षम नहीं था। यह बात सामान्य व्यक्ति तक समझ सकत अहै कि एचएएल और रिलायंस में कौन ज्यादा सक्षम था। आश्चर्य है कि इस बात पर सैन्य समिति ने कोई भूमिका नहीं उठाई और उसने कोई सवाल नहीं उठाया।

निस्संदेह फ्रासीसी कंपनी दसां ने भी होमवर्क किया होगा। उन्हें भी पता होगा कि रिलायंस की इस क्षेत्र में क्या हैसियत है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स क्या कर सकता है। उन्हें इस बात की भी भनक होगी कि अगर किसी निजी कंपनी के साथ कररा के लिये सरकार इस कदर बेकरार है तो इसमें कितना काला है। भारत सरकार की छवि उनके मन में क्या बनी होगी, समझा जा सकता है।

कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी सहित बाकी विपक्ष अगर सरकार को अरदब में ले रहे हैं, कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री ने देश के साथ, सेना के साथ विश्वासघात किया, जिस 64 करोड़ रुपये के घोटाले वाले बदनाम बोफोर्स सौदे में महज चार प्रतिशत कमीशन की बात थी, इस इस घोटाले में कमीशन कम से कम 30 प्रतिशत खाया गया है।

विरोधियों ने इस सारी प्रक्रिया को दिवालिया हो रहे अनिल अंबानी को 21 हजार करोड़ का फायदा पहुंचाने की बात कर रहे हैं या फिर भारी कमीशनखोरी तथा कई अनियमितताओं की दुहाई दे रहे हैं, तो सरकार को इनके खिलाफ कुछ ठोस सबूत तत्काल पेश करने चाहिये। साथ ही मामले को संसदीय समिति को सौंपने में नहीं हिचकिचाना चाहिये।

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