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Editorial by Tridib Raman

कश्मीर में अपनी नाकामी छिपाने के लिये किया गया यह फैसला घाटी में समस्याओं का अंबार खड़ा कर देगा

सरकार को मौका महबूबा ने ही दिया। पर उसे मिशन 2019 के साथ साथ देश और कश्मीर के बारे में सोचना चाहिये था


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सीजफायर एक गलती थी, अब उसे आगे बढा कर सरकार अपनी गलती दुहराने का रिस्क नहीं ले सकती थी तय था। सरकार के पास पीडीपी के सथ अपने कमजोर हो चुके रिश्ते को तोड़ने का यह एक मजबूत बहाना था। और इसी बहाने एक दूसरे को कई बरस ढोने वाले रिश्ते का आखीरकार अचानक अंत हो गया।

भाजपा ने पीडीपी से नाता तोड़ लिया जबकि इस मामले में पीडीपी पीछे रह गयी. देश, कश्मीर, कश्मीरी और वहां की सियासत का क्या होगा इस बात को एक क्षण के लिये परे रख दें तो भाजपा ने चुनावी साल के उत्तरार्ध में पीडीपी से अचानक नाता तोड़ कर बेहद शानदार पर शातिराना सियासी पैंतरा खेला है। 

भले ही इसके प्रतिफलन पर सघन आलोचनाएं की जायें, पर कश्मीर में विफल रही केंद्र सरकार ने जिस तरीके से अपने साथी पीडीपी से किनाराकशी कर के अपने को बचाया है, उसको घाटी की राजनीति में कई बरसों के लिये पीछे धकेल दिया है, उस राजनीतिक कौशल की तारीफ होनी चाहिये।

हालांकि लचर दलीलों के आधार पर लिये गये इस पूर्व नियत फैसले से अगर किसी का कोई भला होगा, जिसका होना भी संदिग्ध ही है, तो वह भाजपा को ही हो सकता है, वर्ना इससे देश, कश्मीर, कश्मीरी जनता किसी का कोई भला नहीं होने वाला।यह अलग तथ्य है कि इसका मौका महबूबा ने ही दिया।

महबूबा की राजनीति जिस रास्ते पर थी केंद्र के पास भरपूर मौका था कि वह अपनी चाल खुल कर खेले लेकिन सिवाय इसके कि कोई सकारात्मक तरीका ढूंढा जाता, सरकार ने सब कुछ दरकिनार कर महज सियासी नफा तलाशा। 

अब कश्मीर में चुनी हुई पार्टी की कोई सरकार बनने की सूरत नजर नहीं आती, न ही केंद्र तब तक उसे बनने देने में कोई रुचि रखेगा जब तक भाजपा उसमें न शामिल हो। हां, भाजपा छोड़ सब एक साथ आ जायें तो कोई बात बन सकती है, जो दूर की कौड़ी लगने के बावजूद राजनीति में सब संभव है कि तर्ज पर हो सकता है।

फिलहाल तो यही लगता है कि अब सूबे को अगले छह महीने राज्यपाल शासन के तहत रहना होगा, परोक्ष तौर पर केंद्र सरकार का शासन। उसके बाद आम चुनाव होंगे तो यह अवधि बढ कर राष्ट्रपति शासन तक जायेगी। कश्मीर के मसायल इस दौरान और उलझने वाले हैं क्योंकि केंद्र की आक्रामक नीति से उसकी यह सोच झलकती है कि कश्मीर तो देश का अंग है पर कश्मीरी नहीं। 

एक कश्मीरी दर्जी को जीप की बोनट पर बांध कर घुमाने वाले मामले में भाजपा ने कह ही दिया था कि प्रेम और युद्ध में सब जायज है। सेना का काम बढ़ेगा क्योंकि आक्रामकता के जवाब में हिंसा  बढ़ने के इमकानात हैं।

जनता को इस अशांति में पहले भी राहत नहीं थी, अब और हलकान होगी। विकास कार्य नहीं हो सकेंगे। भाजपा के साथ जाने के बाद पीडीपी की साख वहां की जनता में बहुत गिर चुकी है।

भाजपा ने अपने साथी पीडीपी को उस मुकाम पर पहुंचा कर छोड़ा है, जहां उसकी लोकप्रियता तली में आ चुकी है, पिछला उपचुनाव यह तस्दीक कर चुका है। पीडीपी अपनी खोई ज़मीन वापस पाने के लिये संभव है कि ऐसी अतिरेकी राजनीति पर उतर आये जो परोक्षत: राष्ट्रविरोधी लगे।

बेमेल, अप्राकृतिक तथा अपवित्र गठबंधन जैसे नामों से पुकारे जाने वाने भाजपा-पीडीपी रिश्ते शुरुआत से ही, दिखावे को छोड़ दें, तो भीतर से बहुत सहज नहीं रहे। सरकार का पीएम डेवलपमेंट पैकेज रोकना, पीडीपी का हसीब द्राबू को बाहर करना,कठुआ मामले की कड़वाहट, कई बार ऐसा लगा कि यह साथ अब नहीं चलेगा। 

पर यह टूटा तब, जब खुद भाजपा के विधायकों और घाटी के उसके नेताओं को इसकी खबर नहीं थी, बस कुछ अंदेशा सा था। सरकार भविष्य में अपने फैसले को राष्ट्रवादी रंग दे सकती है। 

वह तर्क गढ़ सकती है कि पीडीपी आतंकियों की तरफदार है, हमने नाता तोड़ लिया। पर यह बात तो शुरुआत से ही पता थी, उसके लिये इतने बरस तक इंतज़ार क्यों! साफ है कि सरकार के पास सिवाय सत्ता को लेकर कोई सोच नहीं, कश्मीर को लेकर कोई स्पष्ट नीति या रूपरेखा नहीं है। वह बस 2019 के आम चुनाव देख रही है।

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