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जीवनशैली


सफाई के बाद घरों में रह जाती है औसतन 125 ग्राम धूल, सांस के लिए बन सकती है दिक्कत

"घर में मौजूद जहरीले प्रदूषक अत्यंत अल्प मात्रा में भी खतरनाक है, क्योंकि हम अपना ज्यादातर समय घर में बिताते हैं और लगातार सांस लेते रहते हैं। लेंसेट कमिशन के जीबीडी अध्ययन में पाया गया कि साल 2016 में कुल 90 लाख लोगों की वायु प्रदूषण से असमय मौत हुई, जो कि कुल वैश्विक मौतों का 16 फीसदी है"


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दिल्ली के घरों में रोजाना की साफ-सफाई के बाद भी हर घर में औसतन 125 ग्राम धूल होता है, जो कॉर्पेट, मैट्रेस या सोफा और कार के नीचे होते हैं और इसमें तिलचट्टे का मल भी होता है। छिपी हुई धूल को लेकर किए गए एक अध्ययन में यह जानकारी मिली है। 

डायसन इंडिया और फिक्की रिसर्च एंड एनालिस सेंटर (एफआरएसी) द्वारा दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरू में करीब सौ घरों में किए गए अपनी तरह के इस पहले अध्ययन में पाया गया कि घर के केवल चार स्थानों - कॉरपेट, मैट्रेस, सोफा और कार के नीचे से औसतन 125 ग्राम धूल निकला, जिसमें तिलचट्टे का मल भी शामिल है। जबकि उन घरों में रोजाना की जानेवाली साफ-सफाई हो चुकी थी। 

छिपे हुए धूल और उससे होनेवाली विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से निजात पाने के लिए डायसन ने पिछले हफ्ते डायसन साइक्लोन वी10 कॉर्ड-फ्री वैक्युम क्लीनर और डायसन प्योर कूल एडवांस्ड टेक्नॉलजी एयर प्यूरिफायर उतारा था। 

इस बारे में आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर (सिविल इंजीनियरिंग विभाग), 'द लेंसेट कमिशन ऑन पॉल्यूशन एंड हेल्थ' के सह-लेखक और सोसाइटी फॉर इंडोर एनवायरोनमेंट के उपाध्यक्ष मुकेश खरे ने बताया, "2016 पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (ईपीआई) के मुताबिक, 3.5 अरब से ज्यादा लोग, जो कि दुनिया की आधी आबादी है, असुरक्षित हवा में सांस ले रहे हैं, जिसमें भारत की 75 फीसदी आबादी शामिल है।"

उन्होंने कहा, "घर में मौजूद जहरीले प्रदूषक अत्यंत अल्प मात्रा में भी खतरनाक है, क्योंकि हम अपना ज्यादातर समय घर में बिताते हैं और लगातार सांस लेते रहते हैं। लेंसेट कमिशन के जीबीडी अध्ययन में पाया गया कि साल 2016 में कुल 90 लाख लोगों की वायु प्रदूषण से असमय मौत हुई, जो कि कुल वैश्विक मौतों का 16 फीसदी है।"

सोसाइटी फॉर इनडोर एनवायरोनमेंट की संस्थापक सदस्य प्रियंका कुलश्रेष्ठ ने कहा, "इसके पुख्ता सबूत मिले हैं कि वायु प्रदूषण से नवजात का कम वजन, तपेदिक, हृदय रोग, मोतियाबिंद, अस्थमा और नासोफेनजील और लेनजील कैंसर्स होते हैं। नए शोध में पाया गया है कि वायु प्रदूषण संज्ञानात्मक विकास को भी प्रभावित कर सकता है।"

उन्होंने आगे कहा, "वायु प्रदूषण के कारण हर साल 5 वर्ष से कम आयु के करीब 6,00,000 बच्चे मारे जाते हैं। एक अध्ययन से पता चलता है कि वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली के 22 लाख स्कूली छात्रों के फेफड़ों को नुकसान पहुंचा है, जो कभी ठीक नहीं हो सकते।"

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