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राजनीति


क्या इन चुनावी नतीजों से क्षेत्रीय क्षत्रप कांग्रेस और राहुल गांधी को महागठबंधन का नेता मान लेंगे?

एक साथ तीन राज्यों में कांग्रेस ने सीधी लड़ाई में भाजपा को हरा दिया है। दरअस्ल, इन प्रदेशों में अपनी सरकार बनाने से ज़्यादा बड़ा हासिल कांग्रेस के लिए इन परिणामों से बनने वाली धारणा है। राजनीति असल में धारणा का ही खेल होती है। अब पूरे देश में यह मैसेज चला गया कि कांग्रेस भी बीजेपी को हरा सकती है


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हिंदुस्तान की हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्यों-मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान-की भाजपा सरकारों ने इस्तीफ़ा दे दिया है और इन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बनने जा रही हैं। यह 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बहुत बड़े बदलाव का संकेत है।

2013 के मध्य में आख़िरी बार कर्नाटक में कांग्रेस ने सीधे मुक़ाबले में भाजपा को हराया था। उसके बाद लगातार पाँच वर्षों से भी अधिक समय तक जब भी बीजेपी और कांग्रेस की सीधी टक्कर हुई, तो कांग्रेस को मुँह की खानी पड़ी।

2014 के आम चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, असम, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक में यह हुआ। हालांकि गुजरात और कर्नाटक में कांग्रेस ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी। क्षेत्रीय दल यह कहने लगे थे कि मोदी और भाजपा को हम ही हरा सकते हैं, कांग्रेस में यह क्षमता नहीं है।

इस धारणा को दिल्ली और बिहार के चुनाव परिणामों से भी बल मिला। इन दो राज्यों में भाजपा को क्षेत्रीय दलों ने मोदी लहर की तरुणाई के दौर में बुरी तरह हरा दिया।

इस धारणा से कांगेस के 2019 में मोदी के ख़िलाफ़ बनने वाले सम्भावित महागठबंधन की अगुवाई करने की क्षमता पर गम्भीर सवाल उठ रहे थे। क्षेत्रीय क्षत्रप उसे गम्भीरता से लेने के मूड में नहीं थे। 11 दिसम्बर, 2018 के इन चुनाव परिणामों ने एक झटके में सारी परिस्थिति बदलकर रख दी है।

एक साथ तीन राज्यों में कांग्रेस ने सीधी लड़ाई में भाजपा को हरा दिया है। दरअस्ल, इन प्रदेशों में अपनी सरकार बनाने से ज़्यादा बड़ा हासिल कांग्रेस के लिए इन परिणामों से बनने वाली धारणा है। राजनीति असल में धारणा का ही खेल होती है। अब पूरे देश में यह मैसेज चला गया कि कांग्रेस भी बीजेपी को हरा सकती है।

अब यह धारणा बनेगी कि कांग्रेस भी मोदी की भाजपा का विकल्प बन सकती है, जो वह लगातार पाँच वर्षों से कहीं नहीं बन पा रही थी। दरअस्ल, यही राजनीतिक धारणा कमज़ोर दिखने वाली कांग्रेस को एक नई संजीवनी देगी। अब 2019 में लड़ाई बराबरी के प्लेटफॉर्म पर होने जा रही है।

भाजपा और मोदी की यह कोशिश अब निष्फ़ल होती दिख रही है कि चुनाव से पहले ही कांग्रेस के हारे हुए होने का संदेश दे दिया जाय। इन परिणामों से एनडीए के ख़िलाफ़ बनने वाले सम्भावित महागठबंधन को भी ताक़त मिलने वाली है। इस महागठबंधन की सबसे बड़ी दिक़्क़त नेतृत्व की थी।

अब लगता है कि कई क्षेत्रीय क्षत्रप कांग्रेस और राहुल गांधी को महागठबंधन का नेता मान लेंगे। कुल मिलाकर इन चुनावों के दोनों निचोड़ केन्द्र में सत्ताधारी दल की मुश्किलें बढ़ाते हुए दिख रहे हैं।

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