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अम्मा - द डॉग लेडी | कूड़ा बीनने वाली एक महिला 400 कुत्तों को अपने बच्चों की तरह पाल रही है

परेशानियां चाहे जितनी आई हों, लेकिन अम्मा का कुत्तों से लगाव कभी कम नहीं हुआ और देखते ही देखते कुत्तों की संख्या भी बढ़ती चली गई। आज अम्मा लगभग 400 कुत्तों की देखभाल खुद से करती हैं


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दक्षिणी दिल्ली के साकेत में स्थित पीवीआर के पास एक झोपड़ी है। फटे-पुराने कपड़ों से ढकी यह झोपड़ी, हिन्दुस्तान की किसी भी मलिन बस्ती में रहने वाले गरीब के घर की तरह ही दिखती है, लेकिन इस झोपड़ी की एक खास बात है कि यहां दिन भर सैकड़ों कुत्तों का डेरा जमा रहता है।

जानते हैं क्यों! क्योंकि इस झोपड़ी में रहती हैं, इन कुत्तों को अपने बच्चों की तरह पालने वाली, 65 साल की एक बूढ़ी अम्मा जो दिनभर कूड़ा बीनती हैं और बमुश्किल 200 रुपये प्रति दिन कमा पाती हैं। लेकिन इतनी कम कमाई का भी अधिकतर हिस्सा अम्मा, अपने पड़ोस के कुत्तों पर खर्च कर देती हैं। जी हां, मानवता के बड़े-बड़े मानकों को भी पार कर जाने वाली यह मार्मिक कहानी है, रैगपिकर प्रतिमा देवी की, जो लगभग 400 कुत्तों का खयाल रखती हैं।

प्रतिमा देवी, जिन्हें लोग अम्मा कहकर बुलाते हैं, 30 साल पहले जब दिल्ली आई थीं, तो उन्होंने लोगों के घरों में खाना बनाने का काम शुरू किया। कुछ साल बाद, उन्होंने साकेत के पी.वी.आर अनुपम कॉम्प्लेक्स के पास, एक पान-सिगरेट की दुकान शुरू कर दी और यही वह समय था, जब उन्होंने आस-पास के कुत्तों की देखभाल करनी शुरू की। 

लेकिन, एक दिन एम.सी.डी ने उनकी दुकान गिरा दी, तो उन्होंने जीवन-यापन के लिए कूड़ा बीनने का काम शुरू किया। आस-पास की दुकानों और कार्यालयों से, कचरा इकट्ठा करने के बाद, वह उसे छांट कर बेच देती हैं, इससे जो भी आमदनी होती है, उसी से वह कुत्तों की देखभाल करती हैं।

परेशानियां चाहे जितनी आई हों, लेकिन अम्मा का कुत्तों से लगाव कभी कम नहीं हुआ और देखते ही देखते कुत्तों की संख्या भी बढ़ती चली गई। आज अम्मा लगभग 400 कुत्तों की देखभाल खुद से करती हैं। इनमें से लगभग 150  कुत्ते तो अम्मा के छोटे से घर में ही रहते हैं और बाकी आस-पास की जगहों पर घुमते रहते हैं।

पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम की रहने वाली प्रतिमा की शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी, लेकिन वैवाहिक दुर्व्यवहार से तंग आकर, बेहतर जीवन की तलाश में, वह दिल्ली भाग आई थीं।

यहां आकर, प्रतिमा को जीवन की नई उम्मीद और अभिलाषा मिली और उन्होंने कुत्तों की देखभाल में अपना खोया सुकून पाया। आम लोगों के लिए भले ही वह कुत्तें हों, लेकिन प्रतिमा के लिए, वे उनका पूरा परिवार हैं। प्रतिमा कहती हैं कि अपने गांव में भी उन्हें कुत्तों से खासा लगाव था।

प्रतिमा अपने कुत्तों की हर जरुरत का पूरा ध्यान रखती हैं। वह उन्हें दिन में दो बार खाना खिलाती हैं, शाम को दूध देती हैं और उनके लिए हर तरह का इलाज व टीकाकरण का ध्यान रखती हैं। प्रतिमा, कुत्तों को स्वास्थ्य से संबंधित किसी भी समस्या के लिए, फ्रेंडिकोस नामक एक पशु कल्याण संगठन ले जाती हैं। प्रतिमा को इस संगठन से पूरा समर्थन भी मिल रहा है। 

अम्मा की यह खूबसूरत मदद की कहानी, अब दूर-दूर तक पहुंच गयी हैं। बहुत से लोग उनसे मिलने और उनकी मदद करने भी आते हैं। कई लोग अम्मा के पास आकर, कुत्तों को पालने के लिए हाथ बढ़ाते हैं और अम्मा खुशी-खुशी उन लोगों को अनुमति दे देती है, इस तरह, अब कई कुत्तों को उनके अपने घर मिल गए हैं।

प्रतिमा के पास अपनी खुद की दवाएं खरीदने या टूटी हुई छत को ठीक कराने के लिए पैसा नहीं हैं, लेकिन फिर भी वह इन कुत्तों की देखभाल करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं।

लेकिन प्रतिमा गरीब नहीं हैं, बल्कि हम तो प्रतिमा को सबसे अमीर कह सकते हैं, क्योंकि उन्होंने उन बेसहारा कुत्तों की मदद करने के लिए, अपने अमीर होने का इंतजार नहीं किया। 

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