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कम्युनिस्ट आंदोलन और सामाजिक न्याय की अवधारणा

इस देश की कम्युनिस्ट पार्टियों पर हमेशा से सवर्ण वामपंथ का वाहक होने के आरोप लगते रहे हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने जाति के प्रश्न पर लगभग कोई काम नहीं किया। वामदलों के सांगठनिक ढांचे में भी लगभग सवर्णों का ही दबदबा रहा है


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इस देश की कम्युनिस्ट पार्टियों पर हमेशा से सवर्ण वामपंथ का वाहक होने के आरोप लगते रहे हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने जाति के प्रश्न पर लगभग कोई काम नहीं किया। वामदलों के सांगठनिक ढांचे में भी लगभग सवर्णों का ही दबदबा रहा है।

भारत के कॉमरेड आर्थिक ग़ैर बराबरी ख़त्म करने की बात तो करते हैं, लेकिन सामाजिक ग़ैर बराबरी का ख़ात्मा करने तथा इसे फ़लीभूत करने के आरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे हथियारों के प्रति उनकी नीतिगत और ज़मीनी उदासीनता सभी प्रगतिशील लोगों को खलती रही है।

ये अलग बात है कि तमाम प्रश्नों पर साम्यवादियों से वैचारिक निकटता के चलते अकादमिक विद्वान वाम राजनीति के इस खालीपन को नज़रंदाज़ ही करते आये हैं।

जाति भारतीय समाज की एक कड़वी सच्चाई है। जाति के प्रश्न पर काम किये बिना भारत की बुनियादी समस्याओं का कोई भी ठोस हल प्रस्तुत करना संभव नहीं है। इसे डॉ अम्बेडकर और डॉ राम मनोहर लोहिया जैसे नेता अच्छी तरह समझते थे, इसलिए उनकी राजनीतिक विरासत आज साम्यवादियों के मुक़ाबले ज़मीनी तौर पर ज़्यादा प्रासंगिक है।

मेरा मानना है कि भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों के लगातार सिकुड़ते जाने और उनकी राजनीति के दिन-ब-दिन अप्रासंगिक होते जाने की तमाम वजहों में से एक बड़ी वजह सामाजिक न्याय के आंदोलन के प्रति उनकी उदासीनता है।

आज 21वीं सदी के भारत में राजनीतिक तौर पर प्रासंगिक बने रहने के लिए सोशल जस्टिस के अवयवों को अपनी नीतियों और कार्यक्रमों में शामिल करने की अनिवार्यता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कभी आरक्षण और भारत के प्रगतिशील संविधान का विरोध करने वाले संघ परिवार ने दिखाने के लिए सही, सामाजिक न्याय और अंबेडकर को अपनाना शुरू कर दिया है।

देश के शीर्ष पद पर पहुँचे उसके सबसे सफ़ल स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी ताल ठोककर कहते हैं कि वे आरक्षण पर आँच नहीं आने देंगे। वोट बटोरने की नीयत से ही सही, उनके यहाँ अलग-अलग जातियों और वर्गों के तमाम प्रकोष्ठ बने हैं। इन सबके बावजूद हिंदुस्तान के कॉमरेडों ने जाति और सामाजिक न्याय के प्रश्न पर भारत के समाज को अपनी ओर से कोई ठोस समझ देने की पहल नहीं की।

इसके बजाय वे अक्सर हिंदुस्तानी समाज की 'टिपिकल अपर कास्ट मानसिकता' से उपजे इस वाक्य का पॉलिटिकल स्लोगन के तौर पर सहारा ले कर बच निकलते हैं कि जाति की राजनीति बुरी है।

इन सबके बीच 2015 में जेएनयू प्रकरण से उपजे छात्र आंदोलन, जिसे कम्युनिस्ट पार्टियों के छात्र संगठनों ने संचालित किया था, से कुछ ऐसी आवाज़ें सुनाई दीं, जिन्होंने भारत के साम्यवादी आंदोलन और सामाजिक न्याय के आंदोलन के बीच एक नए क़िस्म के गठजोड़ की संभावनाएं पैदा कीं।

इस मूवमेंट के केंद्र में रहे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार तब बेझिझक अपने भाषणों में ब्राह्मणवाद और सवर्णवाद से आज़ादी मांगते हुए दलितों और पिछड़ों के हक़ की बात करते थे।

कन्हैया स्वयं कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीआई) के छात्र संगठन से जुड़े थे। एक उम्मीद जगी कि मुख्यधारा की राजनीति में आकर कन्हैया कुमार जैसे युवा कॉमरेड साम्यवादियों की नीतियों और कार्यक्रमों में सामाजिक न्याय के प्रश्नों को जगह दिलाएंगे। उम्मीद इसे लेकर भी पैदा हुई कि इस नए क़िस्म के राजनीतिक समायोजन से न सिर्फ़ सोशल जस्टिस के आंदोलन का भला होगा, बल्कि कम्युनिस्ट आंदोलन का भी एक नए सिरे से उत्थान हो सकेगा।

लेकिन आज जब कन्हैया कुमार मुख्यधारा की राजनीति में औपचारिक तौर पर उतर चुके हैं और लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं, तो उन्होंने इस उम्मीद को लगभग ख़त्म कर दिया है। अब वे दलितों और पिछड़ों के हक़ को लेकर उस तरह मुखर नहीं हैं और न ही वे अब 'ब्राह्मणवाद से आज़ादी' और 'सवर्णवाद से आज़दी' का स्लोगन देते हैं।

कुछ दिन पहले पटना में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जाति की राजनीति पर एक पत्रकार द्वारा पूछे गए तीखे सवाल का उन्होंने बेहद निराशाजनक जवाब दिया। वे भी अपनी राजनीतिक जमात के वरिष्ठों की तरह यही कहते नज़र आये कि जाति की राजनीति को वे ख़त्म करना चाहते हैं।

उत्तर भारत में कास्ट पॉलिटिक्स के साथ सोशल जस्टिस के जो आयाम जुड़े हैं, उस पर वे कुछ नहीं बोले। बेगूसराय में अपनी राजनीतिक सभाओं में भी वे आरएसएस की विचारधारा को तो काउंटर करते हैं, वर्तमान सरकार की नीतियों की ज़बरदस्त आलोचना तो करते हैं, लेकिन जेएनयू के अपने दिनों की तरह देश में व्याप्त सवर्ण दबदबे के ख़िलाफ़ आक्रामक नहीं होते हैं।

क्या यह इसलिए है कि वे स्वयं सवर्ण (भूमिहार) हैं और बेगूसराय में लगभग पौने पाँच लाख भूमिहार मत निर्णायक साबित होने वाले हैं? अथवा यह इसलिए है कि वे भी अपनी पार्टी (सीपीआई) की पुरानी लीक पर चलकर ही राजनीति करना चाहते हैं?

जो भी हो, कन्हैया कुमार के इस वैचारिक संशोधन ने न सिर्फ़ सामाजिक न्याय के आंदोलन को एक नयी धार मिलने की उम्मीद को नाउम्मीदी में तब्दील किया है, बल्कि भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के पुनरुत्थान की संभावना को भी ख़त्म कर दिया है।  

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