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पाँच हज़ार वर्षों की उदार संस्कृति की विरासत का दावा हम कैसे करें?

वास्तविकता यह है कि कट्टर राष्ट्रवाद हमारे भीतर इंसानियत क़ीमत पर ख़तरनाक स्तर तक फल-फूल चुका है। हमारी इंसानियत मर चुकी है या निहायत ही अवसरवादी व परिस्थितिजन्य हो गयी है


five-thousand-year-old--legacy-of-liberal-culture-but-its-really-worth

लोग भले ही इंसानियत को राष्ट्रवाद से जोड़ें, लेकिन दुनिया का इतिहास यही कहता है कि अक्सर क़ौमों की कट्टर राष्ट्रवादी भावनाओं की तुष्टि मानवता की क़ीमत पर ही हुई है।

कश्मीर में 19 माह की बच्ची हिबा की एक आँख पैलेट गन की गोली से लगभग चली गयी है। गोली ने उस मासूम की कार्निया को छेद दिया। वह भी तब, जब वह अपने घर में थी, न कि सड़क पर उतरकर पत्थर चला रही थी।

कितने लोगों को इस हृदय विदारक घटना पर अफ़सोस हुआ है और कितनों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है? दरअस्ल, हमने यह मान लिया है कि कश्मीर हमारा है, लेकिन कश्मीरी बस मरने के लिए बने हैं।

वास्तविकता यह है कि कट्टर राष्ट्रवाद हमारे भीतर इंसानियत क़ीमत पर ख़तरनाक स्तर तक फल-फूल चुका है। हमारी इंसानियत मर चुकी है या निहायत ही अवसरवादी व परिस्थितिजन्य हो गयी है। अब इस दुखद घटना के बाद हुई चीज़ों को देखें।

आपके यहाँ यदि किसी बच्चे की पुलिसिया कार्रवाई में मौत हो जाय या वह गम्भीर रूप से घायल हो जाय, तो परिवार वालों को कितना मुआवज़ा मिलेगा? कम-से-कम 20 लाख से तो बात ही शुरू होगी।

अब कश्मीर में देखिए, क्या हुआ है। एक 19 माह की बच्ची की बायीं आँख पैलेट गन की गोली से लगभग चली गयी है। एक सर्ज़री हुई है, लेकिन डॉक्टर कह रहे हैं कि और बेहतर इलाज़ नहीं हुआ, तो आँख में इंफ़ेक्शन बढ़ सकता है। बच्ची के घर वाले ग़रीब हैं और जैसे-तैसे उसका इलाज़ करा रहे हैं।

अब इन बातों से ज़्यादा सोचनीय और शर्मनाक बात यह है कि सरकार ने पीड़िता के परिवार वालों को महज़ एक लाख का मुआवज़ा देने की बात कही है। वह पैसा भी उन्हें 2021 में मिलेगा।

क्या देश भर से केवल इंसानियत के नाते यह आवाज़ नहीं उठ सकती है कि हिबा के इलाज़ की सारी ज़िम्मेदारी सरकार ले और उसके घर वालों को बेहतर मुआवज़ा मिले? क्यों हम कश्मीर के मासूमों के लिए भी आवाज़ नहीं उठा सकते हैं? क्या 19 माह या पाँच साल का मासूम भी पत्थरबाज और मिलिटेंट है?

क्या एक समाज के तौर पर हम इतने निष्ठुर और असंवेदनशील बन चुके हैं कि बच्चों के लिए हमारा स्नेह भी देशकाल और परिस्थितियों के मुताबिक़ तय होने लगा है?

सोशल मीडिया, जो आजकल सार्वजनिक विमर्श का सबसे बड़ा केंद्र है, पर कितनी आवाज़ें इस बच्ची के हक़ में बुलंद हुई हैं? इन तमाम सवालों के जवाब दिए बिना हम पाँच हज़ार वर्षों की उदार संस्कृति की विरासत का दावा नहीं कर सकते हैं।

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