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अहिंसक विकास का गांधी मार्ग

अर्थ और संवेदना भले आज दो भिन्न और विजातीय तकाजे हैं, एक के साथ होकर दूसरे तक नहीं पहुंचा जा सकता। पर गांधी की दृष्टि इसी पहुंच को स्वराज से लेकर स्वदेशी और स्वावलंबन तक हर जगह सुनिश्चित करने का नाम है।


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इसी सुनिश्चय को गांधी के प्रिय अर्थ चिंतक कुमारप्पा स्थायित्व (परमानेंस) की हद तक भरोसेमंद होने का तर्क देते हैं। एक ऐसे देश में जहां 54 फीसद संसाधन पर करोड़पतियों का कब्जा (न्यू वर्ल्ड वेल्थ रिपोर्ट-2016) है और जहां 7.30 करोड़ लोग (ब्रुकिंग्स रिपोर्ट-2018) गरीब ही नहीं बल्कि घोर दरिद्रता की स्थिति में जीने को विवश हैं, वहां गांधी की एक अर्थनीति सबसे ईमानदार मानवीय दरकार और सरोकार का नाम है। उस गांधी की अर्थनीति जिसे कई अर्थ पंडित आज भी गंभीरता से नहीं लेते।

गांधी के अनन्य और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जेसी कुमारप्पा की एक किताब है- 'द इकोनमी ऑफ परमानेंस’। अहिंसक जीवनमूल्यों के प्रति आस्थावान दुनियाभर के आर्थिक विद्वानों के बीच इस किताब को बाइबिल सरीखा दर्जा हासिल है। इस किताब के पहले अध्याय में ही कुमारप्पा इस मिथ को तोड़ते हैं कि अर्थ और विकास कभी स्थायी हो ही नहीं सकते।

औद्योगिक क्रांति से लेकर उदारीकरण तक का अब तक हमारा अनुभव यही सिखाता रहा है कि विकास की दरकार और उसके मानदंड बदलते रहते हैं। पर जो सोच हर बार सतह पर दिखीवह यही कि बचेगा वहीटिकेगा वहीजो ताकतवर होगा। अर्थशास्त्रीय शब्दावली में इसके लिए जो सैद्धांतिक जुमला इस्तेमाल होता हैवह है- सर्ववाइवल ऑफ द फिटेस्ट। इस दृष्टि में मानवीय करुणा और अस्मिता के लिए कितना स्थान हैसमझा जा सकता है। यह समृद्धि और विकास की हिंसक दृष्टि है।

गांधी और उनके मूल्यों को लेकर नई व सामयिक व्याख्या रचने वाले सुधीर चंद्र इस परहेज को अपनी तरह से एक 'असंभव संभावना’ के तौर पर देखते हैं। यानी सत्यप्रेम और करुणा के दीये सबसे पहले मन में जलाने का आमंत्रण देने वाले गांधी के पास आधे-अधूरे मन से जाया भी नहीं जा सकता। क्योंकि फिर वो सारी कसौटियां एक साथ हमें सवालों से बेध डालेंगीजो गांधी की नजरों में मानवीय अस्मिता की सबसे उदार और उच्च कसौटियां हैं।

इस विरोधाभास को और समझना हो और सीधे-सीधे विकासस्वावलंबन और उपार्जन को लेकर गांधीवादी आर्थिक सैद्धांतिकी की बात करनी हो तो कुमारप्पा की किताब सबसे बेहतर और समाधानकारी जरिया है। 

कुमारप्पा स्पष्टता के साथ कहते हैं कि विकेंद्रित स्तर पर 'संभव स्वाबलंबन’ को मूर्त ढांचे में तब्दील किए बिना देश की आर्थिक सशक्तता की मंजिल हासिल नहीं की जा सकती है। भारतीय ग्रामीण परंपरा और संस्कृति में सहअस्तित्व और स्वावलंबन का साझा स्वाभाविक तौर पर मौजूद है।

दुर्भाग्य से विकास को शहरीकरण की रौशनी में पढ़ने वाले नीतिकारों को यह साझा या तो दिखता नहीं है या फिर इसके महत्व को वे समझ नहीं पाते। जो ग्रामीण जीवन महज कुछ कोस की दूरी पर अपनी बोली और पानी के इस्तेमाल तक के सलूक में जरूरी बदलाव को सदियों से बरतता रहा हैउसे यह अक्ल भी रही है कि उसकी जरूरत और पुरुषार्थ को एक जमीन पर खड़ा होना चाहिए। गैरजरूरी लालच से परहेज और मितव्ययिता ग्रामीण स्वभाव का हिस्सा है।

पर बदकिस्मती देखिए कि इस स्वभाव पर रीझने की जगह इसे विकास की मुख्यधारा से दूरी के असर के रूप में देखा गया। नतीजतन एक परावलंबी विकास की होड़ उन गांवों तक पहुंचा दी गईजो स्वावलंबन को अपनी जीवन जीने की कला मानते थे। 

कुमारप्पा के शब्दों में कहें तो जीवनसंस्कृति और पुरुषार्थ का साझा बनाए रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे विकास और स्वावलंबन के अस्थायी या गैर टिकाऊ होने का संकट नियंत्रित होता है।

कुमारप्पा का अर्थशास्त्र स्वतंत्र भारत के हर व्यक्ति के लिए आर्थिक स्वायत्तता एवं सर्वांगीण विकास के अवसर देने के उसूल पर आधारित है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और इसके प्राकृतिक स्वरूप को उन्नत करने के हिमायती कुमारप्पा ऐसे बिरले अर्थशास्त्री रहेजो पर्यावरण संरक्षण को औद्योगिक-वाणिज्यिक उन्नति से कहीं अधिक लाभप्रद मानते थे। 

गांधी जिस ग्राम स्वराज की बात करते हैं उसकी रीढ़ है कृषि और ग्रामोद्योग। इसे ही विकेंद्रित अर्थव्यवस्था का नाम दिया गया। गांधी ने कृषि अर्थव्यवस्था में भारत के चिरायु स्वावलंबन के बीज देखे थे।

ऐसा भला होता भी क्यों नहीं क्योंकि वे दक्षिण अफ्रीका से भारत आने पर सबसे पहले गांवों की तरफ गएकिसानों के बीच खड़े हुए। चंपारण सत्याग्रह इस बात की मिसाल है कि गांधी स्वराज की प्राप्ति के साथ जिस तर्ज पर अपने सपनों के भारत को देख रहे थेउसमें किसान महज हरवाहा-चरवाहा या कुछ मुट्ठी अनाज के लिए चाकरी करने वाले नहीं थे बल्कि देश के स्वावलंबन का जुआ अपने कंधों पर उठाने वाले पुरुषार्थी अहिसक सेनानी थे। 

दिलचस्प है कुमारप्पा विदेश से अर्थशास्त्र की पढ़ाई करके गांधी के पास आए थे। गौरतलब है कि कोलंबिया विश्वविद्यालय में सार्वजनिक वित्त का अध्ययन करने के दौरान प्रख्यात अर्थशास्त्री एडविन सेलिग्मन के मार्गदर्शन में उन्होंने 'सार्वजनिक वित्त एवं भारत की निर्धनता’ विषय पर पर महत्वपूर्ण शोधपत्र लिखा थाजिसमें भारत की आर्थिक दुर्दशा में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नीतियों से हुए नुकसान का अध्ययन किया गया था।

इस अध्ययन के दौरान ही कुमारप्पा ने पाया कि भारत की दयनीय आर्थिक स्थिति का मुख्य कारण ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की अनैतिक और शोषक नीतियां हैं। भारत लौटकर जब वे गांधी से मिले तो उन्होंने कुमारप्पा को गांवों के स्वावलंबन के लिए कृषि और ग्रामोद्योग की दरकार समझाई।

गांधी की सीख कुमारप्पा के मन और चिंतन के करीब तो थी हीउन्हें इसमें अपने अंदर के कई सवालों का समाधान भी मिला। जाहिर हैवे गांधी से गहरे तौर पर प्रभावित हुए। बाद में उन्होंने कृषि और ग्रामोद्योग की दरकार को गांधी की अहिंसक आर्थिक सैद्धांतिकी के रूप में गढ़ाजिसमें शोषण की जगह सहयोग और उपभोग की जगह जरूरी आवश्यकता को उन्होंने सबसे बड़ी कसौटी माना।

भारत में शहरी खपत और आयात के लिए जब पहली बार गन्ना खेती की होड़ मची और किसानों को इसके निर्यात और बढ़ी आमदनी का लालच दिया गया तो कुमारप्पा ने न सिर्फ इसका विरोध किया बल्कि वे इसके लिए आंदोलन तक पर उतारू हो गए। उन्हें साफ लगा कि इससे भारत की विकेंद्रित आर्थिक रचना पूरी तरह परावलंबी हो जाएगी और ग्रामीण किसान-मजदूर शोषण केशिकार होंगे।

कुमारप्पा की तब की आशंका आज के भारत की कितनी बड़ी भयावह सच्चाई बन गई है, कहने की जरूरत नहीं। आज आंकड़ों में किसानों की आत्महत्या और गरीबी की जो भयावह तस्वीर उभरी हैवह विकास की उदारवादी व्यवस्था पर सामने से उंगली उठाती है।

आज भी इस चक्रव्यूहीय प्रश्न का उत्तर अगर किसी के पास है तो वह गांधी हैंउनकी अहिंसक दृष्टि है। एक ऐसी दृष्टि जो हमारे गले में इस बात की ताबीज डालती है कि अगर कोई संशय हैकोई दुविधा है तो अंतिम आदमी की फिक्र करो और तय करो कि क्या तुम्हारा निर्णय उसके जीवन को बेहतर बनाएगाउसके लिए कोई खुशी लाएगा।

अगर उत्तर हां है तो फिर कदम बढ़ाने में कोई हिचक नहीं। पर अगर जवाब में नकार है तो तय मानो कि तुम जो सोच रहे हो,जो करने की उधेड़बुन में लगे हो वो न सिर्फ तुम्हारे लिए बल्कि समस्त मानवता के लिए अकल्याणकारी है। 

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