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राजनीति


भारतीय संविधान और समानता | क्या वास्तव में भारत गणराज्य का संविधान सबको समान नहीं मानता?

हमारा संविधान 'वास्तविक समानता' के सिद्धांत पर आधारित है और उसकी नज़र में सभी समान हैं। जिस सतही समानता की अपेक्षा लोग संविधान से करते हैं, उसे अपनाकर वह अंधा व बहरा बन जाएगा


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आजकल टेलीविजन डिबेट्स और सोशल मीडिया में संविधान विरोधी सुर सुनायी देना आम गया है। संविधान पर सबसे बड़ा आक्षेप यह लग रहा कि वह 'समानता के सिद्धांत' पर आधारित नहीं है।

संकीर्णतावादियों द्वारा हमारे संविधान पर ऐसा आरोप कभी आरक्षण, कभी कॉमन सिविल कोड और कभी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान होने के संदर्भ में लगाया जाता है।

ऐसा नहीं है कि संविधान बनने और लागू होने के बाद ऐसी बातें नहीं होती थीं। तब बहुत बड़ी-बड़ी ताक़तें संविधान का विरोध कर रही हैं। लेकिन तब उन आवाज़ों को जनसमर्थन प्राप्त नहीं था।

आज ऐसी आवाज़ों के लिए बढ़ता जनमत भारतीय गणतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में इस बात का परीक्षण करना आवश्यक हो जाता है कि क्या वास्तव में भारत गणराज्य का संविधान सबको समान नहीं मानता। 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 यह कहता है कि क़ानून के समक्ष सभी समान होंगे। अनुच्छेद 15 के अनुसार, राज्य जाति, धर्म, नस्ल, भाषा, लिंग, आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा।

इन दोनों अनुच्छेदों का आशय यही है कि संविधान की नज़र में सभी समान है। लेकिन हमें अनुच्छेद 14 को ठीक से पढ़ना चाहिए। अनुच्छेद 14 में 'विधि के समक्ष समता' शब्दावली का प्रयोग किया गया है।

यह ब्रिटेन के 'विधि के शासन' (रूल ऑफ़ लॉ) के समकक्ष है। लेकिन आर्टिकल 14 में 'विधियों के समान संरक्षण' शब्दावली, जो अमेरिका से ली गयी है, का प्रयोग भी किया गया है। इसका मतलब यह है कि विधि एक जैसे लोगों के साथ एक जैसा व्यवहार करेगी। इन दोनों वाक्यांशों-विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण-को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए, न कि पृथक-पृथक।

वास्तव में, विधियों का समान संरक्षण, विधि के समक्ष समता को व्यापक बनाता है। समाज में भिन्न-भिन्न लोगों की परिस्थितियाँ भिन्न-भिन्न हैं। सामाजिक और आर्थिक ग़ैर बराबरी है। एक ही देश में रह रहे लोगों की भौगोलिक परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं। समाज में ऐसे तबके मौजूद हैं, जो सदियों से वंचित और शोषित रहे हैं।

यदि राज्य सभी को बिना उनकी परिस्थितियाँ देखें समान मानना शुरू कर दे, तो समाज में भयंकर परिणात्मक ग़ैर बराबरी जन्म ले लेगी। यह स्थिति कभी समानता नहीं ला सकती, बल्कि यह समानता को सीमित करेगी। उदाहरण के तौर पर एक 5 वर्ष के बालक और एक नौजवान की दौड़ नहीं कराई जा सकती है।

यदि दौड़ना अनिवार्य है, तो बालक के लिए विशेष प्रावधान करना आवश्यक है। तभी वह दौड़ में बना रह सकता है। इस प्रकार बालक को विशेष संरक्षण देना असमानता का व्यवहार नहीं, बल्कि व्यापक अर्थों में समानता स्थापित करने का प्रयास है। यही हमारे संविधान का दर्शन है।

विधि सबको समान (विधि के समक्ष समता) तो मानेगी, लेकिन वह एक समान व्यक्तियों के साथ एक जैसा व्यवहार (विधियों का समान संरक्षण) करेगी। यहाँ संविधान का उद्देश्य सबको समान मानकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेना नहीं है। इस तरह तो असमानता की खाई और चौड़ी होती जाएगी।

संविधान का उद्देश्य वंचित लोगों के लिए विशेष प्रावधान कर वास्तविक समानता स्थापित करना है। संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) में तथा अनुच्छेद 330 से 342 तक आरक्षण से सम्बंधित जो प्रावधान हैं, वे इसी उद्देश्य के द्योतक है।

इसी प्रकार संविधान के अनुच्छेद 30 में अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि, संस्कृति, आदि की रक्षा के लिए कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं। पर्वतीय राज्यों, जिनकी भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं, के लोगों के लिए भी विशेष प्रावधान हैं। ये सारे प्रावधान अनुच्छेद 14 में प्रयुक्त 'विधियों के समान संरक्षण' के अंतर्गत हैं और 'रूल ऑफ़ लॉ' को व्यापक बनाते हैं।

दरअस्ल, समस्या नज़रिये को लेकर है। सवाल यह है कि हम समानता को किस रूप में देख रहे हैं। हम उसे संकुचित और शाब्दिक तौर पर ले रहे हैं अथवा उसके व्यापक अर्थों में। 'ई.वी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु स्टेट' (1974) के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 'संविधान प्रदत्त समानता' के अधिकार की व्याख्या करते हुए, उसे बंधनो से मुक्त कर दिया।

न्यायालय ने कहा कि समानता एक गतिशील अवधारणा है और इसे पारम्परिक तथा अव्यवहारिक सीमाओं के भीतर 'बन्द, ठूसा और सीमित' नहीं किया जा सकता है।

मेरी समझ से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समानता को लेकर की गयी यह टिप्पणी संविधान में निहित समानता की अवधारणा पर लग रहे तमाम आक्षेपों को शांत करने के लिए पर्याप्त है। वास्तव में, समानता की कोई निश्चित परिभाषा नहीं बनाई जा सकती है।

परिणामों में समानता आवश्यक है, न कि प्रकियाओं में। परिणाम में समानता लाने के लिए प्रकिया में असमानता लायी जा सकती है। इसे असमान व्यवहार नहीं, अपितु आवश्यक और विशेष संरक्षण कहा जायेगा।

अतः यह स्पष्ट है कि हमारा संविधान 'वास्तविक समानता' के सिद्धांत पर आधारित है और उसकी नज़र में सभी समान हैं। जिस सतही समानता की अपेक्षा लोग संविधान से करते हैं, उसे अपनाकर वह अंधा व बहरा बन जाएगा।

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