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राजनीति


क्या नरम हिंदुत्व के रास्ते पर चलकर राहुल गांधी कांग्रेस को एक बेहद ख़तरनाक रास्ते पर लेकर जा रहे हैं!

कांग्रेस की उस नरम हिंदुत्व की पॉलिटिक्स का असर केवल उस एक चुनाव के नफ़े-नुक़सान तक सीमित नहीं रहा। उसका एक सबसे बड़ा असर यह हुआ कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों, जो दशकों तक पार्टी के मजबूत गढ़ रहे थे, में उसका अल्पसंख्यक वोट बैंक उससे छिटक गया और नवोदित क्षेत्रीय दलों के पास चला गया


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राजीव गांधी ने 1989 में बतौर प्रधानमंत्री लोकसभा चुनाव का अपना अभियान उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद (अयोध्या) से शुरू किया था। राजीव ने वहाँ कहा कि मैं भी रामभक्त हूँ और मैं देश में रामराज्य लाना चाहता हूँ। 

यह तब की कांग्रेस का धर्म की राजनीति के प्रति झुकाव परिलक्षित करने वाली कोई पहली घटना नहीं थी, बल्कि यह उन तमाम घटनाओं की एक कड़ी थी, जो कांग्रेस को 'सॉफ़्ट हिंदुत्व' की ओर ले जाने के सूत्रीकरण का हिस्सा थे। 

इससे पहले राजीव गांधी की सरकार की शह पर ही अयोध्या में मन्दिर का ताला खोला गया था और उसके बाद विहिप ने वहाँ मन्दिर का शिलान्यास किया। 

ऐसा माना जा रहा था कि बोफ़ोर्स के आरोपों से घिरी कांग्रेस हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण के सहारे एक बार फिर अपनी चुनावी नैया पार लगाना चाहती है। लेकिन तब उसके मंसूबे सफ़ल नहीं हो सके और 1989 में हुए आम चुनाव में पार्टी 404 से 194 सीटों पर आ गयी। 

लेकिन कांग्रेस की उस नरम हिंदुत्व की पॉलिटिक्स का असर केवल उस एक चुनाव के नफ़े-नुक़सान तक सीमित नहीं रहा। उसका एक सबसे बड़ा असर यह हुआ कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों, जो दशकों तक पार्टी के मजबूत गढ़ रहे थे, में उसका अल्पसंख्यक वोट बैंक उससे छिटक गया और नवोदित क्षेत्रीय दलों के पास चला गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी इन राज्यों में हाशिये पर चली गई। अब लगभग तीन दशक बाद एक बार फिर कांग्रेस सॉफ़्ट हिंदुत्व के रास्ते पर चल पड़ी है। यह पिछले वर्ष के अंत में गुजरात विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ था। 

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तब राज्य में चुनाव प्रचार के दौरान ख़ूब मंदिरों का दौरा किया। उसी दौरान जब वे सोमनाथ मंदिर गए और उनके धर्म को लेकर विवाद हुआ, तो कांग्रेस ने बक़ायदा तस्वीर जारी कर उन्हें जनेऊधारी पंडित बताया। राहुल के मंदिर-मंदिर फिरने का सिलसिला कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान भी जारी रहा। 

अब पाँच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में प्रचार करते हुए भी वे मंदिरों में जा रहे हैं और पार्टी द्वारा इसका ख़ूब प्रचार भी किया जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले ही वे राजस्थान के पुष्कर में ब्रह्मा मन्दिर गए और वहाँ उन्होंने अपना गोत्र भी बताया। 

इन राज्यों के लिए पार्टी की ओर से जारी किए गए चुनावी घोषणापत्रों में भी कई हिन्दू कार्ड शामिल हैं, मसलन मध्य प्रदेश में प्रत्येक गांव में गौशाला खोलने का वादा किया गया है। 

राहुल के कुछ दिन पहले कैलाश मानसरोवर जाने का भी पार्टी ने ख़ूब प्रचार किया और पार्टी कार्यकर्ताओं ने जगह-जगह बैनरों-पोस्टरों के माध्यम से उन्हें शिवभक्त बताया। कांग्रेस के नरम हिंदुत्व की ओर जाने के संकेत केवल उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष के मन्दिर जाने और उनके 'उच्च वर्गीय हिन्दू' पहचान पर ज़ोर देने तक ही सीमित नहीं है। 

पार्टी अब अपने पंथनिरपेक्षता के मूल सिद्धांत पर भी बल नहीं दे रही है और उसके नेताओं के वक्तव्यों में दो-चार रटे-रटाये जुमलों के सिवाय अल्पसंख्यक हितों की रक्षा के लिए कुछ नहीं होता है। अचानक से वह भारतीय गणराज्य के सबसे ज़रूरी स्तम्भ-सेकुलरिज्म-के प्रति उदासीन हो गयी है। 

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की रीति-नीति में अचानक आये इस बदलाव की वजह से सियासी विश्लेषक हैरान तो हैं ही, लेकिन वे इसके मायने तलाशने की भरपूर कोशिश भी कर रहे हैं। 

दरअस्ल, 2014 के आम चुनाव में पार्टी की करारी हार की समीक्षा के लिए बनी एंटनी कमेटी ने उस चुनाव में पार्टी की हार की एक बड़ी वजह उसकी एन्टी हिन्दू छवि का बनना बताया था।

उसके बाद लगातार कई राज्यों में चुनावी हार के बाद पार्टी के रणनीतिकारों की यह धारणा मजबूत हो गयी कि देश के बहुसंख्यकों के बीच उसकी छवि ख़राब हुई है और यह उसकी लगातार चुनावी पराजय का बड़ा कारण है। 

सम्भवतः पार्टी के भीतर हुए इसी मंथन ने उसे नरम हिंदुत्व की राजनीति की ओर जाने के लिए प्रेरित किया है। कांग्रेस के रणनीतिकार यह अच्छी तरह जानते हैं कि इस तरह की राजनीति के सहारे वे भाजपा और संघ की तरह हिन्दू मतों का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण करने में क़ामयाब नहीं हो पाएंगे। 

उनका मूल मक़सद पार्टी की एन्टी हिन्दू छवि को ख़त्म करना और हिंदुत्व के फ़ैक्टर को न्यूट्रलाइज करना है, ताकि भाजपा जनहित के ज़रूरी मसलों पर अपनी जवाबदेही से बचने के लिए हिंदुत्व के खोल में न छुप सके। हो सकता है कि पार्टी अपनी इस रणनीति में बहुत हद तक क़ामयाब हो जाय। 

लेकिन इस तरह की राजनीति के ज़बरदस्त ख़तरे भी हैं। देश के जिन-जिन राज्यों में भाजपा का सीधा मुकाबला कांग्रेस से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों से है, वहाँ अल्पसंख्यक मत उन क्षेत्रीय पार्टियों के पाले में ही हैं। 

चूँकि बहुसंख्यक मतों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के पास है, इसलिए उन राज्यों कांग्रेस हाशिये पर है। जिन राज्यों में कांग्रेस और बीजेपी की सीधी राजनीतिक लड़ाई है, वहाँ अल्पसंख्यक वोटबैंक और उदार बहुसंख्यकों के मतों के सहारे कांग्रेस का आधार मजबूत है। 

यदि अस्सी के दशक के उत्तरार्ध और नब्बे के दशक के पूर्वार्द्ध की तरह सॉफ़्ट हिंदुत्व पर चलने की वजह से इन राज्यों में अल्पसंख्यक वोट यूपी-बिहार की तरह कांग्रेस से नवोदित क्षेत्रीय दलों के पास स्थाई तौर पर ट्रांसफ़र हो जाएं, तो कांग्रेस देश भर में हाशिये पर चली जायेगी। 

इन राज्यों में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात जैसे राज्य शामिल हैं। इसकी सम्भावना तब और बनती है, जब ओवैसी जैसे मुसलमानों की राजनीति करने वाले नेता कांग्रेस को मुस्लिम विरोधी साबित करने पर तुले हैं। 

यह अल्पावधि में भले ही न हो, लेकिन पार्टी के एक लंबे समय तक इस राह पर चलने से उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति की पुनरावृत्ति उसके दूसरे मजबूत गढ़ों में होने की संभावना बहुत हद तक बनती है। कुल मिलाकर कांग्रेस एक बेहद ख़तरनाक रास्ते पर चल रही है। 

यदि उसने वर्तमान में अपने सॉफ़्ट हिंदुत्व के एजेंडे और अपने सेकुलर अतीत के बीच एक ज़रूरी संतुलन नहीं साधा, तो वह दीर्घकाल में राजनीतिक तौर पर अप्रासंगिक हो सकती है।

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