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साहित्य/संस्कृति


‘किताब’ फिल्म का प्रीमियर: किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं!

नई दिल्ली में फिल्म डिवीजन ऑडिटोरियम में निर्देशक कमलेश के. मिश्र की शॉर्ट फिल्म ‘किताब’ का प्रीमियर हुआ, प्रीमियर से पहले ‘इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के बढ़ते प्रभाव में किताबों का अस्तित्व’ विषय पर परिचर्चा की गयी


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बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो

ऐ काश हमारी आँखों का इक्कीसवाँ ख़्वाब तो अच्छा हो।

गुलाम मोहम्मद कासिर के लिखे इस शेर से किताबों का हमारी जिंदगियों में क्या महत्त्व है, आसानी से समझा जा सकता है। सदियों से ज्ञान के रूप में किताबें ही मानव जीवन का वो आधार रही हैं जिसपर आदर्श जीवन और बेहतर दुनिया का ख्वाब खड़ा हो सका है। लेकिन आधुनिक युग में बेतहाशा तकनीक के इस्तेमाल ने किताबों के अस्तित्व पर भी कई बार सवालिया निशान लगा दिया। इसी जद्दोजहद को दिखाती निर्देशक कमलेश के. मिश्र की शॉर्ट फिल्म ‘किताब’ का प्रीमियर नई दिल्ली के फिल्म डिवीजन ऑडिटोरियम में रखा गया। साथ ही प्रीमियर से पहले ‘इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के बढ़ते प्रभाव में किताबों का अस्तित्व’ विषय पर सारगर्भित परिचर्चा भी आयोजित की गयी। 

किताबें सुविधाजनक होती हैं, गैजेट्स नहीं

इस अवसर पर प्रसिद्द लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि किताबों की संस्कृति कभी खत्म नहीं होगी। उन्होंने किताबों के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किताबों का इतिहास अगर देखें, तो वह दौर जब भोजपत्र पर लिखा जाता था, तब से लेकर आज तक किताबें कई बार बदलीं, कई नए नए प्रयोग किये गए। लेकिन किताबों के महत्त्व पर कोई असर नहीं पड़ा।

अपने लेखन में स्त्री-विमर्श को प्रमुख स्थान देने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने कहा स्त्री-विमर्श को हर जगह पहुंचाने और इसको लेकर लोगों को जागरूक बनाने में किताबों का बहुत बड़ा हाथ है। किताबें हमेशा से ही एक लेखक की संवेदना और उसकी आवाज को लोगों तक पहुंचाती रही हैं। 

आधुनिक युग में बदल गया है किताब का स्वरुप

वरिष्ठ पत्रकार त्रिदीब रमण ने गुलजार की मशहूर कविता ‘किताबें झांकती हैं बंद आलमारी के शीशों से’ पढ़कर परिचर्चा की शुरुआत की। उन्होंने कई सारे उदाहरणों के माध्यम से आधुनिक युग में किस तरह किताबों की भूमिका बदली है, इस पर बात की। उन्होंने कहा भले ही हम लोगों को लग रहा हो कि किताबें हमारे समाज से दूर जा रही हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। युवा पीढ़ी का कहना है कि किताबें और गैजेट्स एक-दूसरे के पूरक हैं। आज की युवा पीढ़ी किताबों के साथ-साथ किंडल जैसे गैजेट्स का भी इस्तेमाल करती है, जहां पर बहुत सी पाठ्य सामग्री पढ़ने के लिए मौजूद रहती है। इसके साथ-साथ ‘वॉट पैड’ और ‘जगरनॉट’ जैसे एप का भी पढ़ने के लिए बहुतायत में इस्तेमाल हो रहा है, जहां बहुत सी पाठ्य सामग्री मुफ्त में भी उपलब्ध है। 

त्रिदीब रमण ने आधुनिक युग में किताबों के बदलते स्वरुप पर एक रोचक किस्सा साझा करते हुए एक चर्चित पुस्तक ‘चेजिंग रेड’ का जिक्र किया। लेखिका इजाबेल रोनिन के इस पहले उपन्यास ने आते ही धमाका कर दिया था। ‘चेजिंग रेड’ को सबसे पहले ‘वॉट पैड’ पर रिलीज किया गया था और वहां इसे तकरीबन 17.4 करोड़ लोगों ने पढ़ा। पाठकों और लेखिका के बीच कई दौर का संवाद भी हुआ। कई पात्रों और घटनाओं को बदला गया। अंत में, किताब के इस डिजिटल रूप की सफलता को देखते हुए, किताब का छपा हुआ संस्करण लाया गया और बाजार में आते ही, यह बेस्ट सेलर किताब में शामिल हो गई।

फिल्म की कहानी: किताबों को बचाने के लिए टॉम अल्टर की जद्दोजहद

परिचर्चा के बाद 'किताब' का प्रीमियर हुआ। फिल्म ‘किताब’ ने अपने खुबसूरत फिल्मांकन और दिल को छू लेने वाली कहानी से सभी का मन मोह लिया। 25 मिनट की इस शोर्ट फिल्म में मुख्य पात्रों का कोई भी संवाद नहीं है, लेकिन इसके बाद भी शानदार अभिनय और जरुरी विषयवस्तु से सजी यह फिल्म अपने संदेश को लोगों तक पहुंचा देती है। फिल्म में लाइब्रेरी के प्रति लोगों की कम होती रुचि को दिखाया गया है। फिल्म में कोई संवाद नहीं है, इसीलिए सिर्फ बैकग्राउंड संगीत के माध्यम से ही फिल्म आगे बढ़ती हैं।

फिल्म की कहानी एक सार्वजनिक पुस्तकालय (लाइब्रेरी) के इर्द-गिर्द घूमती है। इस सार्वजनिक लाइब्रेरी में एक उम्रदराज लाइब्रेरियन हैं, जो इसको चला रहे हैं। दिवंगत अभिनेता टॉम अल्टर ने उम्रदराज लाइब्रेरियन की भूमिका निभाई है। गौरतलब है कि अपनी मृत्यु से कुछ वक्त पहले ही उन्होंने इस फिल्म को पूरा किया था।

फिल्म में दिखाया गया है कि साल 2005 में बहुत सारे लोग लाइब्रेरी आते हैं और अध्ययन करते हैं। लेकिन आने वाले सालों में धीरे-धीरे लाइब्रेरी में लोग कम होने लगते हैं और साल 2014 आते-आते लोगों की संख्या लाइब्रेरी में बिलकुल कम हो जाती है। अब बूढ़ा लाइब्रेरियन कम संख्या देखकर परेशान होने लगता है। लेकिन तभी फिल्म में एक ट्विस्ट आता है और एक युवा लड़की लाइब्रेरी आती है। वह लाइब्रेरी की सदस्य बनती है और बूढ़ा लाइब्रेरियन अब उसके साथ घुलने-मिलने लगता है। धीरे-धीरे दोनों एक दूसरे के अकेलेपन के साथी बन जाते हैं। लेकिन एक दिन अचानक से वह लड़की लाइब्रेरी आना बंद कर देती है, अब बूढ़ा लाइब्रेरियन फिर से परेशान हो उठता है। पहले तो वह कई दिनों तक इन्तजार करता है और अंत में उस लड़की को ढूंढने निकल पड़ता है। इसके आगे की कहानी बेहद दिलचस्प है।

फिल्म में लाइब्रेरी और किताबें के प्रति लोगों की घटती रुचि को बहुत ही बेहतर तरीके से दिखाया गया है। फिल्म का निर्देशन कमलेश के. मिश्र ने किया है। फिल्म में मुख्य अभिनेत्री का किरदार पूजा दीक्षित ने निभाया है। लाइब्रेरी और किताबों के प्रति लोगों को प्रेरित करने की, यह बहुत अच्छी पहल की गई है। 

किताबें हैं, मोहब्बत की कहानी

किताबें किस तरह व्यक्ति को सकारात्मक बना देती हैं, इस पर बोलते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि किताबें और ग्रन्थ यदि आपके घर में हैं तो आपको हमेशा बेहतर संदेश मिलता रहेगा और आप सकारात्मकता से भरे रहेंगे। उन्होंने कहा कि किताबों से बड़ा हमदर्द आपका कोई दूसरा नहीं हो सकता। किताबें ही हैं, जो हमारी सोच या नजरिये का निर्माण करती हैं, इसीलिए बेहतर किताबों के सानिध्य में रहना बहुत जरुरी है। किताबों को सुविधा का दूसरा रूप बताते हुए उन्होंने कहा कि किताबों की संस्कृति मोहब्बत की कहानी है, किताबें हमेशा से ही बेहतर दुनिया बनाने का संदेश देती आई हैं।

‘अल्मा कबूतरी’ और ‘इदन्‍नमम’ जैसे प्रसिद्द उपन्यासों की लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने किताबों की संस्कृति बचाने के लिए सबको साथ आने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि जो जितना पढ़ेगा, उतना बेहतर इंसान बनेगा। गैजेट्स और आधुनिक साधन अपनी तेज और चमकती दुनिया की वजह से लोगों का ध्यान जरूर खींचते हैं, लेकिन ठहराव और सभी भावों के साथ जिस ज्ञान और खुबसूरत दुनिया से किताबें रूबरू करातीं हैं, आधुनिक साधन कभी नहीं करा सकते।

किताबें सहारा देती हैं

इस मौके पर सुलभ प्रणेता डॉ. पाठक ने अपनी जिंदगी में किताब के महत्त्व को बताया। उन्होंने कहा कि किताबों के अस्तित्व पर उठ रहे सवालों को मैं वाजिब नहीं मानता। क्योंकि किताबें किसी भी दौर में अप्रचलित नहीं हो सकतीं। आज के युग में गैजेट्स भले ही किताबों से लैस होकर आ रहे हों, लेकिन जो मजा किताब पढ़ने और सीखने में है वो गैजेट्स से कभी भी नहीं आ सकता। उन्होंने कहा कि गैजेट्स को इलेक्ट्रिसिटी से इन्टरनेट तक कई सहारों की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन किताबों को किसी सहारे की जरूरत नहीं होती।
डॉ. पाठक खुद करीब 32 से ज्यादा किताबें लिख चुके हैं और इस वक्त अपनी ऑटोबायोग्राफी भी लिख रहे हैं। किताबों से सीखकर ही, उन्होंने जिन्दगी में बेहतर करने की प्रेरणा मिलती रही।

इस अवसर पर फिल्म के निर्देशक कमलेश ने सभी आगुन्तकों का धन्यवाद व्यक्त किया। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि जो संदेश वह समाज को देना चाहते थे, वह इस फिल्म के माध्यम से लोगों तक पहुंचा है। उन्होंने निराशा जताई कि टॉम अल्टर की मृत्यु होने से वह इस फिल्म को उन्हें नहीं दिखा पाए। 
 

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