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राजनीति


एक भारत, श्रेष्ठ भारत | क्या आजाद भारत के एकीकरण का पूरा श्रेय सरदार पटेल को जाता है?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देशी रियासतों का भारत में विलय कराकर एक अखण्ड भारत का निर्माण करने में पटेल की बहुत बड़ी भूमिका थी और इसी वजह से उन्हें लौह पुरुष कहा जाता है। उनके नेतृत्व में ही तमाम रजवाड़ो का हिंदुस्तान के साथ एकीकरण संभव हुआ


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31 अक्टूबर को लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयंती है। गुजरात में नर्मदा नदी के तट पर उनकी 182 मीटर उँची प्रतिमा-स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी-बनकर तैयार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस प्रतिमा का अनावरण करेंगे। 

सरदार पटेल की जयंती पर हर वर्ष उन्हें याद किया जाता है। लेकिन इस बार एक ख़ास अवसर होने के कारण कई दिनों पहले से ही मीडिया और सोशल मीडिया में उनके जीवन और कार्यों को लेकर बहस तेज़ हो गयी है। 

देश के प्रथम गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री को लेकर लगातार बोला और लिखा जा रहा है। उन्हें आज़ादी के बाद देश के एकीकरण का एकमेव नायक बताया जा रहा है। 

इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात देशी रियासतों का भारत में विलय कराकर एक अखण्ड भारत का निर्माण करने में पटेल की बहुत बड़ी भूमिका थी और इसी वजह से उन्हें लौह पुरुष कहा जाता है। उनके नेतृत्व में ही तमाम रजवाड़ो का हिंदुस्तान के साथ एकीकरण संभव हुआ। 

लेकिन अक्सर इस विषय होने वाली बहसों में सरदार पटेल के आभाण्डल के तेज़ में वे चेहरे छुप जाते हैं, जिनके बिना भारत का एकीकरण का सपना साकार नहीं हो पाता। सबसे पहले तो यह समझना ज़रूरी है कि देशी रियासतों की समस्या आख़िर पैदा कैसे हुई। 

जब भारत आज़ाद हो रहा था, तो दो तरह के भारत थे। एक मुल्क़ का वह हिस्सा था, जो सीधे ब्रिटिश इंडिया के अंतर्गत आता था। दूसरा वह हिस्सा था, जिन पर राजाओं और नवाबों का शासन था और उन्होंने ब्रिटिश क्राउन की अधीनता स्वीकर की थी। जब ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया, तो उसमें 'लैप्स ऑफ़ पैरामाउंसी' का प्रावधान कर दिया गया।

इसका मतलब यह था कि राजाओं और नवाबों ने ब्रिटिश क्राउन की जो अधीनता (पैरामाउंसी) स्वीकार की थी, वो समाप्त हो गयी और ये रियासतें आज़ादी हो गईं। 

इसका परिणाम यह हुआ कि जब अंग्रेज़ों ने भारत की अंतरिम सरकार को सत्ता हस्तानांतरित की, तो केवल देश के उन्हीं हिस्सों पर उस सरकार का नियंत्रण स्थापित हो पाया, जो ब्रिटिश इंडिया के अंतर्गत आते थे। 

अब लगभग ऐसी 565 स्वतंत्र देशी रियासतें खड़ी हो गयी थीं, जिनके सामने अंग्रेज़ों ने अपनी रियासत का भारत या पाकिस्तान में विलय करने अथवा स्वतंत्र देश बनने का विकल्प रख दिया। परिस्थिति बहुत कठिन थी, क्योंकि सैकड़ों राजा और नवाब अपनी रियासत को अलग मुल्क़ बनाने का सपना देख रहे थे। 

ऐसी हालत में कांग्रेस ने एक बेहद लोकतांत्रिक रवैया अपनाया, जो काफ़ी क़ारगर साबित हुआ। कांग्रेस ने कहा कि ये राजा और नवाब जनता के चुने हुए हुक़्मरान नहीं हैं, इसलिए वे अकेले अपनी जनता के भविष्य का फ़ैसला नहीं कर सकते हैं। 

कांग्रेस ने कहा कि यदि किसी रियासत के राजा और वहाँ की अवाम के बीच रियासत के भविष्य को लेकर मतभेद होगा, तो शासक के बजाय जनता फ़ैसला करेगी। कांग्रेस ने इसके लिए रायशुमारी का विकल्प अपनाया। 

जूनागढ़ का भारत में विलय इसका उदाहरण है। इसके अलावा कांग्रेस ने भौगोलिक एकरूपता को भी मुद्दा बनाया। 

उसका स्पष्ट मत था कि जो रियासत चारों ओर से भारत राज्य की भूमि से घिरी हो, उसका शासक अपने राज्य का विलय पाकिस्तान में करने या स्वतंत्र रहने का फ़ैसला नहीं ले सकता है। कांग्रेस की इन्हीं नीतियों ने जिन्ना को सबसे ज़्यादा परेशान किया, जो भारत को कमज़ोर करने का सपना देख रहे थे। 

वास्तव में, इस नीति के बिना 542 देशी रिसायतों का भारत में विलय और हिंदुस्तान का एकीकरण संभव नहीं था। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि देशी रियासतों के संबंध में यह पॉलिसी कांग्रेस और हिंदुस्तान की अंतरिम सरकार के स्तर पर बनी थी, केवल गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री के स्तर पर नहीं। 

आज़ादी के बाद रिसायतों के विलय के लिए भारत की अंतरिम सरकार में रिसायत डिपार्टमेंट बनाया गया। सरदार पटेल इसके मंत्री और वीपी मेनन इसके सचिव बनाये गये। 

वीपी मेनन को अक्सर इस विषय होने वाली गंभीर बहसों में भी भुला दिया जाता है। वे अंग्रेज़ी राज में अधिकारी थे और आज़ादी के बाद रिटायर होना चाहते थे। 

लेकिन भारत सरकार ने उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें यह महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा। रियासतों के विलय के सभी कागज़ात (इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन) मेनन की देखरेख में ही तैयार कराये गये और उन पर राजाओं और नवाबों के दस्तख़त कराने की जिम्मेवारी उन्हीं की थी। 

इसके अलावा भारत सरकार और रियासतों के शासकों के बीच संवाद क़ायम करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। कई बार तो जोख़िम लेकर भी उन्होंने अपना दायित्व बख़ूबी निभाया।

उन्होंने अपनी किताब 'द स्टोरी ऑफ़ द इंटीग्रेशन ऑफ़ इंडियन स्टैट्स' में एक ऐसी घटना का जिक़्र किया है। जोधपुर के महाराजा हनुमंत सिंह ने लार्ड माउण्ट बेटेन के घर पर उन पर रिवाल्वर तान दी और वायसराय ने उन्हें मुश्किल से बचाया। अब सबसे अंत में लार्ड लुई माउण्ट बेटेन का जिक़्र करना आवश्यक है। 

हिंदुस्तानियों में यह आम धारणा है कि अंग्रेज़ आज़ादी के बाद भी भारत को कमज़ोर करना चाहते थे और भारत के आख़िर वायसराय इसी अंग्रेज़ी नीति को क्रियान्वित करने के लिए भेजे गये थे। यह बात लंदन में बैठी तत्कालीन सरकार के स्तर से तो ठीक हो सकती है, लेकिन माउण्ट बेटेन के स्तर से ऐसा नहीं था। 

स्वतंत्रता प्राप्ति की तारीख़ से बहुत पहले ही क़ौमी दंगे पूरे हिंदुस्तान में भयंकर रूप ले चुके थे और उनमें हज़ारों लोगों ने अपनी जान गंवायी थी। माउण्ट बेटेन इससे बहुत चिंतित थे। 

उन्हें इस बात की फ़िक्र थी कि हिंदुस्तान की आने वाली नस्लें उन्हें कभी इसके लिए माफ़ नहीं करेंगी। वे भारत की अंतरिम सरकार को सत्ता हस्तानांतरित करने के तुरंत बाद वापस ब्रिटेन जाने वाले थे, लेकिन वीपी मेनन की सलाह पर उन्होंने भारत सरकार से कहकर अपना कार्यकाल बढ़वाया और हिंदुस्तान के एकीकरण में सहयोग करने का निर्णय लिया। 

वे ब्रिटिश राज परिवार का हिस्सा थे और इस नाते राजाओं और नवाबों से उनके व्यक्तिगत रिश्ते बहुत अच्छे थे। कई राजा और नवाब उनके मित्र थे। अपने इस प्रभाव का इस्तेमाल उन्होंने इन स्वतंत्र शासकों को भारत के साथ रहने के लिए राज़ी करने में किया। कई राजाओं ने उनसे अपनी व्यक्तिगत मित्रता की वजह से भारत के सात विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये। 

भोपाल के नवाब मोहम्दुल्ला ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन साईन करके माउण्ट बेटेन को ही दिया था। इसके अलावा उनके एक ऐसे भाषण को याद करना ज़रूरी है, जो गेम चेंजर साबित हुआ। वे 'चेंबर ऑफ़ प्रिन्सेज़' के प्रमुख भी थे। चेंबर ऑफ़ प्रिंसेज़ राजाओं और नवाबों का सबसे असदार संगठन था। 

25 जुलाई, 1947 यानी आज़ादी के महज़ बीस दिन पहले माउण्ट बेटेन ने चेंबर ऑफ़ प्रिसेंज को आख़िरी बार संबोधित किया। उन्होंने अपने लंबे भाषण में रायशुमारी और भौगोलिक एकरूपता जैसी कांग्रेसी नीतियों की बात की और इशारे-इशारे में यह साफ़ कर दिया कि ज़्यादतर रियासतों का भारत का साथ रहना ही ठीक रहेगा। 

इससे राजाओं और नवाबों कि यह उम्मीद टूट गयी कि कांग्रेस और भारत की अंतरिम सरकार के ख़िलाफ़ ब्रिटिश गवर्मेंट उनकी मदद करेगी। इसके बाद कुछ को छोड़कर सभी शासकों ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन पर हस्ताक्षर कर दिये। यह माउण्ट बेटेन का भारत के एकीकरण में बहुत बड़ा योगदान था।

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