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साहित्य/संस्कृति


श्रद्धांजलि | कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे!

उनकी कविताओं में दर्द था, प्रेम की पाती थी, समाज के पैमाने पर खरे उतरते दोहे थे, तो प्रेम की खिलाफत करने वाले के लिए विद्रोह भी था। नीरज बादलों से सलाम लेते थे, नदी किनारे गाते भी थे। लेकिन जब उनके मीठे गीतों का कारवां गुजर जाता था, तो लोग यूँ ही एकटक गुबार देखते रहते थे


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धूल कितने रंग बदले डोर और पतंग बदले
जब तलक जिंदा कलम है हम तुम्हें मरने न देंगे

बाग में निकली न फिर हस्ते गुलाबों की सवारी
हर किसी की आँख नम है हम तुम्हें मरने न देंगे!

अगर किसी कवि की कलम से निकले शब्द उसकी ही जिंदगी पर सटीक बैठने लगे, तो समझिये वह कवि अमरता की उस बूंद को पा चूका है, जिसके लिए सागर मंथन किया गया था। महाकवि गोपाल दास नीरज, ऊपर लिखी अपनी कविता को अपने ही जीवन में सार्थक करते हुए, हम सबको छोड़कर चल बसे। 93 साल के महाकवि का लम्बी बीमारी के बाद आज शाम दिल्ली के एम्स निधन हो गया, उनके फेफड़े में संक्रमण था और सांस लेने में दिक्कत हो रही थी।

लेकिन उनके प्रसंशक, उन्हें कभी मरने न देंगे। वे हमारे आँगन के बरगद थे, जो चाहे जितना बूढ़ा हो जाए, लेकिन उसकी छाँव कभी कम नहीं होती और हमेशा बढ़ती जाती है। आज भले ही वह बरगद भौतिक रूप से न रहा हो, लेकिन हमारी जिंदगियों में उसका साया हमेशा रहेगा।

कलम के जादूगर को भी भला कोई भूल पाया है, शोखियों में जब-जब गुलाब घोला जाएगा, तब-तब ये जादूगर लोगों को याद आएगा। 4 जनवरी 1924 को इटावा जिले के पुरावली गांव में जन्मे गोपालदास नीरज, शायद शब्दों को पिरोकर शहद सी मीठी कविताओं की रिमझिम फुहार बरसाने के लिए ही पैदा हुए थे।

शोखियों में घोला जाये, फूलों का शबाब 
उसमें फिर मिलायी जाये, थोड़ी सी शराब
होगा यूं नशा जो तैयार
हाँ...
होगा यूं नशा जो तैयार, वो प्यार है!

उनकी कविताओं में दर्द था, प्रेम की पाती थी, समाज के पैमाने पर खरे उतरते दोहे थे, तो प्रेम की खिलाफत करने वाले के लिए विद्रोह भी था। नीरज बादलों से सलाम लेते थे, नदी किनारे गाते भी थे। लेकिन जब उनके मीठे गीतों का कारवां गुजर जाता था, तो लोग यूँ ही एकटक गुबार देखते रहते थे। 

कभी-कभी लगता है कि नीरज सिर्फ प्रेम का संदेश देने के लिए ही पैदा हुए हैं, अपने गीतों से उन्होंने न जाने कितने दिलों को प्रेम सिखलाया, वे कहते ही थे, "मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए!"

तभी तो मात्र 6 बरस की उम्र में, अपने पिता ब्रजकिशोर सक्सेना खो देने वाले नीरज ने अपनी जिंदगी में कई नौकरियां की, लेकिन उनका मन आखिरकार कविताओं में ही रमा और अपनी रुमानी कविताओं से, उन्होंने देश को न सिर्फ दीवाना बनाया, बल्कि हिंदी कविता के मंच के सबसे लोकप्रिय कवियों में शुमार हो गए।

लिखे जो ख़त तुझे, वो तेरी याद में
हज़ारों रंग के, नज़ारे बन गए
सवेरा जब हुआ, तो फूल बन गए
जो रात आई तो, सितारे बन गए!

कालजयी गीतों के कालजयी कवि नीरज सिर्फ कविता के मंच तक ही सीमित नहीं थे, जब उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में गीत लिखने शुरू, तो 70 के दशक में लगातार तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए बेस्ट फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित हुए। इनमें से  फिल्म 'चन्दा और बिजली' के लिए लिखे गए गीत 'काल का पहिया घूमे रे भइया' के लिए साल 1971 में उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। जबकि अन्य दो गीत साल 1972 में 'बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ' (फिल्म: पहचान) और साल 1972 में 'ए भाई! ज़रा देख के चलो' (फिल्म: मेरा नाम जोकर) को भी खूब सराहना मिली।

आंसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा 

जहां प्रेम का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा ।

हरिवंश राय बच्चन की निशा निमंत्रण को अपनी प्रेरणा मानने वाले नीरज को साल 1991 में उन्हें पद्मश्री और साल 2007 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया, साथ ही उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने नीरज को यश भारती पुरस्कार से भी सम्मानित किया था।

नीरज चले तो गए, लेकिन उनके जाने को शून्य न समझना, क्योंकि बरगद कभी बूढ़ा नहीं होता, सागर कभी सूखता नहीं, बादल कभी बरसना नहीं भूलते। नीरज हमारे बीच हैं, हम सब के साथ, प्रेम की माला लिए हुए, हर इंसान के दर्द से भरे गर्म दिल को शीतल जल जैसे गीतों से बहलाते हुए।

इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में।

 

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिए धुआँ-धुआँ पहन गए,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके,
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शाबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ़ ज़मीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक़्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यों कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गए किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमुक उठे चरन-चरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पोंछ गया सिंदूर तार-तार हुईं चूनरी,
और हम अजान-से,
दूर के मकान से,
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

 

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