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न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति मामला | सेवानिवृत्ति उम्र बढ़ाने को लेकर पूर्व जजों की है अलग-अलग राय

अमेरिका में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ताउम्र सेवा में होते हैं, जबकि ब्रिटेन में सेवानिवृत्ति की उम्र 70 साल है। कुछ अन्य देशों में न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र 70 या 75 साल है


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ऊंची अदालतों के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर 70 साल करने के मसले पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों की राय भिन्न हैं।

इस प्रस्ताव का विरोध करने वाले न्यायाधीशों का कहना है कि 65 साल इष्टतम उम्र सीमा है, क्योंकि इस उम्र में भी न्यायालय के कार्यभार का भारी बोझ वहन करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाना सही नहीं होगा।

न्यायमूर्ति केटी थॉमस और न्यायमूर्ति केएस पाणिकर राधाकृष्णन ने सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने के सुझाव को खारिज कर दिया, जबकि न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी ने इसका पक्ष लिया है।

हाल के दिनों में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने ऊंची अदालतों के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने का मसला कई बार उठाया है। उन्होंने न्यायाधीशों का वेतन भी तीन गुना बढ़ाने की बात कही है। हालांकि यह नरेंद्र मोदी सरकार का रुख नहीं है। 

सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने का समर्थन करने वालों ने जीवन-प्रत्याशा को इसका आधार बताया है। इसकी तुलना अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों की परंपरा से की है।

अमेरिका में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ताउम्र सेवा में होते हैं, जबकि ब्रिटेन में सेवानिवृत्ति की उम्र 70 साल है। कुछ अन्य देशों में न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र 70 या 75 साल है। 

सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने के सुझाव को उचित बताते हुए वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने कहा कि 65 साल के बाद भी काम करने की शारीरिक और मानसिक शक्ति काफी होती है। पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी और वरिष्ठ वकील केवी विश्वनाथन ने भी इस विचार का समर्थन किया है।

विश्वनाथन ने कहा कि न्यायाधीशों के 65 साल की उम्र में सेवानिवृत्त होने का कोई तर्कसंगत औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा, "न्यायाधीश उम्र के पांचवें दशक के अंत में या छठे दशक के आरंभ में परिपक्व बनते हैं।"

अपनी बात की पुष्टि के लिए विश्वनाथन ने न्यायमूर्ति एंथनी मैकलियोड केनेडी का उदाहरण दिया, जिन्होंने 82 साल की उम्र में 2018 में अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में अपनी लेखनी को विराम दी थी। न्यायमूर्ति केनेडी के उत्तराधिकारी न्यायमूर्ति ब्रेट कैवनॉग बने हैं।

रोहतगी, वैद्यनाथन और विश्वनाथन ने न सिर्फ सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने की तरफदारी की, बल्कि उन्होंने उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की उम्र एक समान करने की बात कही, जिसपर न्यायमूर्ति रेड्डी ने असहमति जाहिर की। न्यायमूर्ति थॉमस ने सेवानिवृत्ति की उम्र सीमा में समानता का समर्थन किया, जबकि न्यायमूर्ति रेड्डी का मानना है कि अंतर रहना चाहिए।

न्यायमूर्ति राधाकृष्णन ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति उम्र बढ़ाई जा सकती है, लेकिन सेवानिवृत्ति की उम्र से पूर्व पद छोड़ने का विकल्प होना चाहिए, जो परंपरा जिंबाब्वे में प्रचलित है।

न्यायमूर्ति राधाकृष्णन ने भारत में न्यायाधीशों पर कार्य के बोझ का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिका में सर्वोच्च न्यायालय के पास हर साल 100 से 130 मामले होते हैं। इतने ही मामले इंग्लैंड और अंतर्राष्ट्रीय अदालत में भी होते हैं। लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय को हर साल 65,000 मामलों का सामना करना पड़ता है। 
 

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