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राजनीति


इतना भी बेअसर नहीं रहेगा शिवपाल का समाजवादी सेक्युलर मोर्चा

शिवपाल ने जो ठोकी ताल कई हुए बेहाल: शिवपाल खासे जोश में हैं। उन्हें महसूस हो रहा है कि भले ही झुंझला कर ताव में ये दांव आजमाया हो पर उनका लगाया दांव ठीक पड़ा है। अपनी नयी नवेली पार्टी का संगठन बनाने जहां जहां वे जा रहे हैं। उनको भाव मिल रहा है, भीड़ जुट रही है


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समाजवादी सेक्युलर मोर्चे का झंडा जारी होने के बाद अब पार्टी के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया भी तेज हो गई और संगठनात्मक ढांचा मजबूत करने की कवायद भी। इस तेजी ने सपा के होश गुम कर दिये हैं और बसपा भी किंचित चिंतित है। 

कांग़्रेस सचेत हुयी है तो वहीं भाजपा यूपी के भाजपा अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय शिवपाल यादव की तारीफों के पुल बांधते हुये, उन्हें जमीनी नेता बताते फिर रहे हैं।

जो राजनीति के विश्लेषक यह कह रहे थे कि शिवपाल और उनकी पार्टी आगामी चुनाव में बेअसर साबित होगी, यह बस वोट कटवा भर हो सकती है, वे अब इसे महागठबंधन के मंसूबों पर भी इससे असरकारक मान रहे हैं।

फिलहाल शिवपाल खासे जोश में हैं। उन्हें महसूस हो रहा है कि भले ही झुंझला कर ताव में ये दांव आजमाया हो पर उनका लगाया दांव ठीक पड़ा है। अपनी नयी नवेली पार्टी का संगठन बनाने जहां जहां वे जा रहे हैं। उनको भाव मिल रहा है, भीड़ जुट रही है।

सो उनकी पार्टी सेक्युलर मोर्चे ने सूबे की सभी सीटों से उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। वे अपने टिकट पर समाजवादी पार्टी के मुखिया और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिता तथा अपने बड़े भाई मुलायम सिंह यादव को मैनपुरी से उतारने जा रहे हैं।

अगर वे उनके टिकट से नहीं लड़ते तो वे वह सीट उनके सम्मान में छोड़ कर बाकी 79 सीटों पर मुकाबले को तैयार हैं। शिवपाल पूछते फिर रहे हैं कि अगर वाकई सांप्रदायिक ताकतों से लड़ना है तो महागठबंधन उनसे गुरेज क्यों कर रही है, जबकि उनकी पार्टी के नाम के आगे सेक्युलर भी लगा है।

उनका दावा है कि उनके बगैर महागठबंधन अधूरा है, शिवपाल के इस तरह उत्साह से भरे होने का सबब यह है कि मोर्चे की घोषणा के महीने भर के भीतर कई कद्दावर नेता उनके संपर्क में आ चुके हैं और कुछ ऐसे भी राजनीतिबाज जो थोक वोटों के बड़े आढ़ती हैं।

राजनीति के गणितज्ञ उनको यह बता कर खुश कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी बसपा के साथ गठबंधन के चलते अपनी जो सीटें उसके लिये छोड़ेगी उस पर मोर्चे की जीत पक्की है।

इसी तरह बसपा के विद्रोहियों की सीट पर भी हाथ साफ किया जा सकता है, फिर  एटा, इटावा, मैंनपुरी, कन्नौज, जैसी आधा दर्जन सीटों पर अभी से समाजवादी सेकुलर मोर्चा भारी है।

नजदीकी अंतर से जीत हार वाली सीटों पर ध्यान रखले तो कुल मिलाकर 30 सीटों पर तो जीत तय है। अब अगर पीस पार्टी, ओमप्रकाश राजभर की सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी तथा ओवैसी के दल के साथ भीम आर्मी का समर्थन भी हासिल कर लिया जाये।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाति समीकरनॉं का तानाबाना ठीक कर लिया जाये और मुस्लिम, यादव, दलित समीकरण अपने हक में बनाया जा सके तो इन सीटों की संख्या कुछ बढ भी सकती है।

कभी टिकट कटने पर सपा के खिलाफ खड़े होने वाले शारदा प्रताप शुक्ल  और सपा से दूरी बना चुके अंबिका चौधरी, नारद राय जैसों वरिष्ठ नेताओं का साथ मिलने का शिवपाल को पूरा भरोसा है तो शादाब फातिमा, दीपक मिश्र, नवाब अली अकबर, सुधीर सिंह, प्रोफेसर दिलीप यादव, अभिषेक सिंह आशू, मोहम्मद फरहत रईस खान और अरविंद यादव जैसे दर्जन भर और नेता उनके साथ आ सकते हैं।

मुख्तार अंसारी और ओम प्रकाश सिंह सरीखे नेता भी शिवपाल के खेमे से जुड़ सकते हैं। चर्चा में तो और भी ढेर सारे नाम हैं, शायद वे तेल और तेल की धार देख रहे हैं, मुलायम की मंशा भांप रहे हैं, गठबंधन के ऊंट की करवट और कल निहार रहे हैं।

अपनी सीट की सुनिश्चितता तय कर रहे हैं, पार्टी के रजिस्ट्रेशन का इंतज़ार कर रहे हैं, भले ही पार्टी का रजिस्ट्रेशन अभी बाकी हो लेकिन झंडा सार्वजनिक हो गया है। ये जो झंडा जो आप देख रहे हैं, इसमें लाल और हरा तो समाजवादी पार्टी के पुराने झंडे से लिया गया है पर पीला रंग क्यों और कहां से आया है साफ नहीं हुआ है।

झंडे पर शिवपाल का अपनी तस्वीर लगाने का कोई तुक हो पर मुलायम सिंह यादव जो अभी उनकी पार्टी से नहीं जुड़े हैं और उनका आशीर्वाद बस कथित तौर पर ही शिवपाल के साथ है उनकी तस्वीर का क्या तुक। सियासत में हर बात की तुक नहीं होती, अगर तीर सही निशाने पर लग रहा है, तो बेतुकी चीजें भी दुरुस्त हैं।

हालांकि शिवपाल का तीर बह्ले निशाने पर हो लेकिन शिवपाल के इस नए सियासी कदम से मुलायम सिंह की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। बेटे और भाई को चुनने का धर्म संकट कम बड़ा नहीं होता।

फिलहाल शिवपाल की सक्रियता को देखते हुये सूबे के सियासी हलकों में आजकल एक सवाल तेजी से उभरा है। सवाल यह है कि अगर अखिलेश और शिवपाल के बीच मुकाबला हुआ तो कौन जीतेगा। जवाब है भाजपा।

हद तो यह है कि शिवपाल यादव के मोर्चे का नाम है समाजवादी सेक्युलर मोर्चा और शिवपाल अपने मोर्चे को सांप्रदायिक ताकत यानी भाजपा के खिलाफ बताते हैं, जबकि भाजपा शिवपाल की प्रशंसा कर रही है।

फिलहाल शिवपाल के समाजवादी सेक्युलर मोर्चे क आसर तो होगा देखना यह होगा कि शिवपाल के मोर्चे का असली शिकार कौन बनता है, भाजपा या सपा।

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