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राष्ट्रीय


अंतरिक्ष युद्ध होगा तो ज़रूर पर सामरिक नहीं कारोबारी

अंतरिक्ष में उपग्रहों को नष्ट कर देने की कूव्वत रूस, अमेरिका के बाद अब चीन के पास भी है पर इस ध्वस्तीकरण के बाद जो कचरा अंतरिक्ष में फैला उसे समेटने की बस बातें ही होती हैं। अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ हो या फिर क्षुद्र ग्रहों की खुदाई यह सब अंतरिक्ष में भारी मात्रा में कचरा निर्मित करेगा


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अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के आदेश का पेंटागन पालन करने में लगा है और यह तय है कि 2020 तक अमेरिकी स्पेस फोर्स का गठन हो जायेगा।

अमेरिकी सेना की पांच शाखाओं वायु सेना, नौसेना, थल सेना, कोस्ट गार्ड, मरीन कॉर्प्स के बाद अब स्पेस फोर्स उसकी छठी शाखा बन जायेगा और इसी साल अमेरिकी स्पेस कमांड भी तैयार हो जायेगा।

अंतरिक्ष के क्षेत्र में कई देशों का दखल बेतरह बढा है ऐसे में ट्रंप नहीं चाहते कि रूस, चीन या कोई भी दूसरा देश अमेरिका को इस क्षेत्र में नंबर दो बना दे। बहाना यह भी कि अमेरिकी डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी के निदेशक अमेरिकी सीनेट आर्म्ड सर्विसेज कमेटी को पहले ही यह जानकारी दे दी थी कि रूस व चीन ऐसे हथियार विकसित कर रहे हैं जिसका इस्तेमाल वे अंतरिक्ष युद्ध में कर सकते हैं. मतलब राष्ट्रवाद का पूरा डोज।

पर अमेरिका के इस घोषणा का प्राथमिक उद्देश्य सैन्य या सामरिक कम बल्कि व्यावसायिक ज्यादा है। इसकी तह में है क्षुद्र ग्रहों से खनिज खोदने का अति लाभदायक व्यापक व्यवसाय। भले ही भविष्य में अंतरिक्ष के संसाधनों को लूट से बचाने के लिये किये गये आउटर स्पेस ट्रीटी- 1967 या 1979 के मून एग्रीमेंट का उल्लंघन ही क्यों न हो।

अमेरिका इस कारोबार पर अडिग रहेगा। रूस और चीन प्लेसमेंट ऑफ मिलेट्री वेपन इन आउटरस्पेस संधि पर सबको राजी करने के प्रयास में हैं। हालांकि इसमें विश्व बिरादरी के प्रति उनकी कोई सदाशयता नहीं बल्कि अमेरिका को रोकने के ही नीति है इसीलिये अमेरिका इसके प्रति गंभीर नहीं है।

वजह वह भलीभांति जानता है कि इस संधि के अमल में आने का मतलब है अंतरिक्षीय खुदाई के मामले अपने दबदबे से हाथ हटाना। इस प्रतिस्पर्धात्मक क्षेत्र में अमेरिका अपनी दादागीरी हरहाल में कायम रखना चाहता है चाहे उसे सैन्य सुरक्षा और संप्रभुता का नाम ही क्यों न देना पड़े।

क्षुद्र ग्रहों, ग्रहों के दुर्लभ तथा बहुमूल्य खनिजों का दोहन, इनके खुदाई वैश्विक खतरे को न्योता देने वाली है। जहां लाभ धन का मामला हो और उसका कोई विधि सम्मत वितरण न हो तो घपला और उस पर बवाल होना तय है।

जब आपके पास कोई संसाधन है और उस संसाधन के लिये दूसरों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा है तो ऐसे में आप उस संसाधन को सुरक्षित करने का हर कीमत पर प्रयास करेंगे यह कीमत भारी निवेश की शक्ल में होगी और जब मामले में अपेक्षाएं, लोभ और पैसा, शामिल होगा तो संघर्ष तय है।

जापान की स्पेस एजेंसी जाक्सा ने एक से अधिक क्षुद्र ग्रहों पर अपने रोबोटिक उपकरण भेज चुकी है। अमेरिका में नासा ही नहीं वहां अंतरिक्ष के क्षेत्र में काम करने वाली निजी कंपनियां भी इसमें इसके लिये बढचढ कर प्रयास कर रही हैं। उपकरणों और तकनीक के विकास पर जबरदस्त काम जारी है।

ब्रिटेन और फ्रांस भी इस मामले में पीछे नहीं है। बात महज दिग्गज देशों की ही नहीं है लगभग 80 देश और 85 अंतरिक्ष संगठन हैं जो अंतरिक्ष से खनिजों के दोहन के कारोबार में उपग्रहों, उपकरणों, राकेटों और रोवर्स के विकास और तैनाती में किसी न किसी तौर पर जुड़े हुये हैं। इनकी संख्या बढती जा रही है। हालांकि इसके बावजूद ग्रहों और क्षुद्र ग्रहों से खुदाई अभी भी सही तरह से और बड़े पैमाने पर शुरू हो गयी हो ऐसा नहीं है।

अभी इसमें समय है लेकिन जिस तरह से बहुत से साधन संपन्न और अंतरिक्ष विज्ञान में मजबूत दखल रखने वाले देश इस क्षेत्र में जिस तरह से रुचि दिखा रहे हैं उससे तय है कि निकट भविष्य में ही यह शुरू हो जायेगा और एक बार यह आरंभ हुआ तो शीघ्र ही इसका पैमाना बड़ा हो जायेगा। ज्यों ही यह नौबत आयेगी कुछ दबंग देशों तकरार तय है।

अमेरिका अगर इस मामले में ऐसा कर रह है तो चीन और रूस भी दूध के धुले नहीं हैं। वे किसी भी तरह अमेरिका को बांधना चाहते हैं और इसके लिये उन्होंने श्रीलंका से लेकर नाइजीरिया और नीदरलैंड तक से संपर्क और समर्थन साध रखा है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह माना जा चुका है कि अमेरिका कोई बहुपक्षीय संधि नहीं स्वीकारेगा ऐसे में स्पेस माइनिंग में अमेरिकी दबदबे को रोकने के लिये विश्व के तमाम पर्यावरणविद, अंतरिक्ष विज्ञानी और अंतरिक्ष के बारे में कानूनी मामलों के जानकार इत्यादि मिल कर वूमेरा नामक एक दस्तावेज तैयार कर रहे हैं।

यह दस्तावेज अंतरिक्ष में हथियारों की होड़, बढ़ते अंतरिक्षीय कचरे तथा बेलगाम खुदाई एवं धरती से अंतरिक्ष में लगातार आवाजाही के चलते धरती और अंतरिक्ष पर पड़ने वाले खतरे और पूरी दुनिया के लिये पैदा होने वाले पर्यावर्णीय संकट का खाका खींचने के साथ अंतरिक्ष में खुदाई तथा हथियारों की तैनाती के बारे में नीति नियमन का विस्तृत मसौदा होगा।

इन नियमों और नियंत्रणों के मसौदे को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के जरिये समर्थन जुटा कर अमेरिका ही नहीं इस तरह के तमाम ऐसी मंसूबे रखने वाले देशों की करगुजारी और उनकी दादागीरी रोकी जायेगी।

वूमेरा नामक यह रिपोर्ट भी तभी आ रही है जब अमेरिकी स्पेस फोर्स का गठन संपन्न होने जा रहा है। बेशक अमेरिका द्वारा इस तरह की घोषणा और दावे के पीछे इसका बहुत बड़ा हाथ है। वह इस सारे ग्रहों से खनिज खोदने के कारोबारी मामले को अपनी सुरक्षा, रक्षा और संप्रभुतता का मसला बना देना चाहता है।

ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि अंतरिक्ष के बारे में कोई सर्वभौमिक, सर्वद्शीय और बहूद्देशीय समझौता किया जाये समूचे संसार के लिए यही उचित होगा कि यह अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को रोकने के लिए तो हो ही बल्कि अंतरिक्ष के पर्वार्णीय दोहन से बचाने के लिये भी हो।

इसे रोकने के लिए समय रहते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहल की जरूरत है, अगर ऐसा जल्द ही नहीं हुआ तो निकट भविष्य में दुनिया के तमाम देश नयी-नयी अंतरिक्ष तकनीक हासिल करके अंतरिक्ष में अपना-अपना हिस्सा कब्जाने में जुट जायेंगे और यह अंतत्त: भीषण अंतरिक्षीय युद्ध का सबब बनेगा।

अंतरिक्ष में उपग्रहों को नष्ट कर देने की कूव्वत रूस, अमेरिका के बाद अब चीन के पास भी है पर इस ध्वस्तीकरण के बाद जो कचरा अंतरिक्ष में फैला उसे समेटने की बस बातें ही होती हैं। अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ हो या फिर क्षुद्र ग्रहों की खुदाई यह सब अंतरिक्ष में भारी मात्रा में कचरा निर्मित करेगा।

एक समय यह कचरा भी तना तनी की वजह बनेगा जब किसी के कचरे से टकरा कर किसी का अरबों डालर का मिशन ध्वस्त हो जायेगा अंतरिक्ष में हथियारों का जखीरा लगाना हो या फिर इसके जरिये अपना दबदबा कायम करना  इस सारी प्रक्रिया में अंतरिक्ष युद्ध अवश्यंभावी है, यह हो कर रहेगा पर वजह सामरिक नहीं व्यावसायिक होगी।

अमेरिका का मानना है अथवा वह यह माहौल बना रहा है कि अंतरिक्ष में युद्ध छिड़ॅने वाला है, एंटी सेटेलाइट प्रणाली रखने वाले रूस और चीन दुनिया को खतरे में डालने वाले हैं।

ऐसे में अमेरिका अंतरिक्ष को एक ऐसा नया मोर्चा कह रहा है जिसको फतह करने के बाद ही वह असल में महान अमेरिका कहलायेगा। वह कह रहा है कि स्पेस फोर्स देश की रक्षा और सुरक्षा के लिये अनिवार्य कार्यवाई है।

अमेरिका संचार, नेविगेशन और गुप्त सूचनाओं के लिए उपग्रहों पर अत्यधिक निर्भर है ऐसे में उसे अपने उपग्रहों की सुरक्षा पुख्ता करने के लिये अगर स्पेस कमांड चाहिये तो इस समय चीन,रूस,फ्रांस,इंग्लैंड, जैसे चार देशों के पास पहले से ही मिलिट्री स्पेस कमांड हैं। पर इसे बनाते हुये किसी ने अमेरिका की तरह हल्ला नहीं मचाया, जाहिर है कि खेल कुछ और है।

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