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फीचर


मानवाधिकार दिवस पर विशेष : इंसानों के हक के लिए उन्हें मिलती हैं धमकियां

इंसानों के हक की खातिर अपने जीवन को समिधा की तरह यज्ञाग्नि में झोंक रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं की जिंदगी उतनी आसान नहीं होती, जितनी बाहर से दिखती है। उसमें भी जुनूनी महिलाओं के लिए जोखिम तो दोगुना हो जाता है, क्योंकि जान से मारने के साथ-साथ दुष्कर्म की धमकियां भी उन्हें बार-बार मिलती हैं


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इंसानों के हक की खातिर अपने जीवन को समिधा की तरह यज्ञाग्नि में झोंक रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं की जिंदगी उतनी आसान नहीं होती, जितनी बाहर से दिखती है। उसमें भी जुनूनी महिलाओं के लिए जोखिम तो दोगुना हो जाता है, क्योंकि जान से मारने के साथ-साथ दुष्कर्म की धमकियां भी उन्हें बार-बार मिलती हैं

फिर भी उनकी दिलेरी तो देखिए, इन खतरों के बीच कोई बाल विवाह रोकने में लगा है, तो कोई सिर पर मैला ढोने वालों को अमानवीय दलदल से बाहर निकालने के लिए वर्षो से जद्दोजहद कर रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर जरूरत है, ऐसे ही कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की आपबीती जानने की, जो परिवार को पीछे छोड़ समाज में बदलाव का झंडा बुलंद किए हुए हैं। इन्हीं में से एक हैं, राजस्थान से ताल्लुक रखने वाली मानवाधिकार कार्यकर्ता कीर्ति भारती।

कीर्ति ने बीते कुछ वर्षो में कई बच्चियों को बाल विवाह का शिकार होने से बचाया है। इसी उद्देश्य के साथ कीर्ति ने 2011 में 'सारथी ट्रस्ट' की शुरुआत की। यह एनजीओ बच्चियों के बाल विवाह को रोकने के काम में लगा हुआ है।

कीर्ति के लिए यह राह कभी आसान नहीं रही, उन्हें कई बार जान से मारने की धमकियां तक मिल चुकी हैं। कीर्ति कहती हैं, "मेरी यह लड़ाई उतनी आसान नहीं रही, जितनी बाहर से देखने में लगती है। छोटी-छोटी बच्चियों को बाल विवाह से बचाने के लिए एक सिस्टम की जरूरत थी, यही कारण रहा कि 'सारथी ट्रस्ट' अस्तित्व में आया।

हम अब तक 39 बच्चियों का विवाह निरस्त करा चुके हैं और 1,200 बच्चियों को बाल विवाह का शिकार होने से बचाया है।" वह कहती हैं, "महिला हूं तो रेप की धमकियां भी मिलती हैं। जान से मारने की धमकियां तो बहुत समय से मिल ही रही हैं।"

ऐसे ही एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, अशोक रो कवी। अशोक समलैंगिक अधिकारों के लिए लंबे समय से मुहिम चला रहे हैं। पेशे से पत्रकार रह चुके अशोक ने 1990 में 'बॉम्बे दोस्त' नाम से देश की पहली समलैंगिकों की पत्रिका की शुरुआत भी की थी।

एलजीबीटी अधिकारों के लिए देशभर में काम कर रहा 'हमसफर ट्रस्ट' की स्थापना इन्होंने ही की। आज देश में समलैंगिकों को कानूनी रूप से जो मान्यता प्राप्त है, उसमें 'हमसफर ट्रस्ट' की अहम भूमिका है। 

ऐसे ही एक शख्स हैं, बेजवाड़ा विल्सन जो सिर पर मैला ढोने वालों को इस दलदल से बाहर निकालने के लिए कई वर्षो से संघर्ष कर रहे हैं। मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता बेजवाड़ा अब तक तीन लाख मैला ढोने वालों को नारकीय जीवन से मुक्ति दिला चुके हैं। कोलार के दलित परिवार से ताल्लुक रखने वाले बेजवाड़ा सफाई कर्मचारी आंदोलन का नेतृत्व कर चुके हैं। 

देश में देह व्यापार से कई मासूमों को बाहर निकालने वाली सुनीता कृष्णन ऐसी हजारों लड़कियों को मुख्यधारा में वापस लेकर आई हैं, जिन्हें देह व्यापार में धकेला गया था। इस तरह की लड़कियों को बचाकर वापस मुख्यधारा में लाने के लिए सुनीता ने 'प्रज्वला' नाम के एक एनजीओ की स्थापना की, जो महिलाओं को वेश्यावृत्ति से बचाने में लगा हुआ है।

वह अभी तक 10,000 से ज्यादा महिलाओं को देह-व्यापार के दोजख से निकाल चुकी हैं। इस काम के लिए उन पर 17 बार हमला हो चुका है। पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित सुनीता कहती हैं, "देह-व्यापार से जुड़े लोग चाहते हैं कि मैं उनकी राह से हट जाऊं, ताकि वे इस अमानवीय धंधे में लगे रहें।"

फ्लाविया एग्नेस का नाम शायद ज्यादा लोगों ने नहीं सुना होगा, लेकिन फ्लाविया लंबे समय से महिलाओं को शादी, तलाक और संपत्ति के मामलों में कानूनी मदद मुहैया करा रही हैं। वह अब तक 50,0000 महिलाओं को कानूनी मदद मुहैया करा चुकी हैं। इस काम के लिए उन्होंने 'मलिस' नाम के एक एनजीओ की स्थापना भी की है। 

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