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फीचर


कहानी मीठी इमरती की जो बेहतरीन कलाकारी के साथ स्वाद और सुंदरता का अनूठा संगम है

एक हसीन शाम में अच्छे किस्म की रबड़ी और इमरती की भरी हुई प्लेट से मिलना आस्वाद का अलौकिक अनुभव है


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इमरती यानी वह सुस्वादु, सांस्कृतिक और संपूर्ण स्वदेशी मिठाई, जो सुंदरता और स्वाद के मधुर मीठी कलाकारी का मणिकांचन संयोग है। यह कला, सौंदर्य, आस्वाद, माधुर्य के मिश्रण वाला मोहक मिष्ठान्न है। 

मिठाई की दूकानों पर पिस्ते की छींट और चांदी का वर्क लगा कर, जिस सजावट और अदा के साथ यह पेश होती है, इसके मुकाबले की दूसरी मिठाइयां मांद पड़ जाती हैं। 

आंखों से निहार कर मुंह में मिठास महसूस करा देने वाली इस मिठाई का इसका असली नाम हैं अमृती, यह अमृत का अपभ्रंश है। अब अमृत से सुस्वादु, सार्थक रस और क्या हो सकता है. चाशनी में पगी हुई रससिक्त वर्तुल वेणिसमूह को जिस प्रकार पुष्पाकार दिया जाता है, वह नजाकत देखते ही बनती है। 

अब्दुल हलीम शरर की कालजयी किताब गुजिश्ता लखनऊ की मानें तो यह पेचोखम वाली मिठाई लखनऊ के बावर्चियों की देन है जो पाक कला के मर्मज्ञ होने के साथ ही आला दर्जे के कलाकार भी होते थे।

इमरती देशव्यापी है। मलयालम में इसे जानगीरी कहते हैं, तो केरल वाले भी तकरीबन ऐसे ही पुकारते हैं, हां दक्षिण के कुछ राज्यों या क्षेत्रों में यह झानगरी भी बुलाई जाती है। राजस्थान के कतिपय शहरों में, यह अमरती के नाम से पुकारी जाती है और बेहद लोकप्रिय है। 

पश्चिम बंगाल जो अपने संदेश और रसोगुल्ले, कांचा गुल्ला के किए मशहूर है वहां भी इमरती, ओम्रिति के नाम से जानी जाती है और बंगाली भद्र लोक के खूब जीभचढी है। व्याप्ति में कोई विवाद नहीं पर इसके उद्भव को लेकर ज़रूर खींचातानी है। 

कुछ मानते हैं कि यह मुगलों की खोज है, तो कुछ का कहना है कि यह सबसे पहले राजस्थान में बनी, तो अधिकतर प्रमाण इस पक्ष में जाते हैं कि यह अवध की ईजाद है, फिलहाल इमरती को जनम देने के दो ही मजबूत दावे है एक राजस्थान का और दूसरा अवध का। 

क्योंकि यह बात साबित हो चुकी है कि जलेबी भले ही अरब से भारत आई हो, पर इमरती ठेठ भारतीय ईजाद है। कम से कम यह जलेबी का संशोधित संस्करण वाली मिठाई तो कतई नहीं है।

इमरती के राजस्थानी उद्भव को मानने वाले, इसे राजपूतों के कुशल रसोइयों का आविष्कार बताते हैं। उनके अनुसार, यह सबसे पहले मुगलों की रसोई से निकली और पश्चिमी हिंदुस्तान के राजपूत रजवाड़ों के दरबार में बतौर तोहफा पहुंचाई गई, राजपूतों ने इसे अपनी 'रजवाड़ी थाली' या 'राज भोग' का हिस्सा बना लिया। 

पूर्वी और दक्षिण भारत की रियासतों ने भी मुगलों को खुश करने के लिए इसे अपनी शाही थाली या राजसी भोजन में बाखुशी शामिल कर लिया और जब राजा ने इसे अपना लिया, तो फिर समूचा दक्षिण भी इमरती की मिठास से अछूता कैसे रहता। 

दूसरे क्षेपक के अनुसार, राजपूत रसोइयों की यह ईजाद मुगलों को बहुत पसंद आई और उन्होंने रजवाड़ों की राजभोग थाल का हिस्सा बन चुके, इस अमृति को अपने रसोई में ले गए, थोड़ी और नफासत के साथ इसे इमरती के नाम से पेश किया, क्योंकि अमृति का उच्चारण उनके लिए मुश्किल था। राज मुगलों का था सो उनके नाम पर इमरती को बड़ा बाजार और मकबूलियत मिली।

राजस्थान के अलावा इमरती पर दूसरा दावा अवध का है, यह दावा राजस्थान से किंचित मजबूत है। हालांकि राजस्थान में कई मिठाइयों की रचना हुई है फिर भी वह अपने नमकीनों की श्रेष्ठता के लिए ज्यादा जाना जाता है। इमरती की ईजाद अवध में हुई इसको मानने की कुछ खास वजह है। 

नजाकत भरी कलात्मक मिठाइयों के उद्भव का केंद्र अमूमन अवध रहा है, इमरती के लिए सबसे प्रसिद्ध स्थान जौनपुर भी अवध क्षेत्र में है। हालांकि अवधी खान-पान में बहुत से व्यंजन ईरान और अरब मुल्कों से आये और उनका विधिवत भारतीयकरण हुआ, लेकिन जहां तक इमरती का सवाल है, कम से कम इसके बारे में इस तरह का कोई ठोस विवरण नहीं मिलता।

अवध, खास तौर पर लखनऊ के कलाप्रिय बावर्चियों ने खानपान के अपने क्षेत्र में की अद्भुत प्रयोग किए हैं, भले ही उसमें से कई अब विलुप्त हो चुके हैं पर उनकी तमाम ईजाद के दस्तावेज मौजूद हैं. इन्ही कालाकार बावर्चियों ने इमरती ईजाद की जिसे तब के बादशाह, नवाब, जागीरदार और अमीर उमरा ने अपनाया और खासकर इसे मुगलों ने इसे गर्मजोशी से अपनाया।

मुगलिया, कला संस्कृति खान पान और तहजीब के लिए राजस्थान से कहीं ज्यादा अवध प्रभावित और प्रसिद्ध था, अत: वर्तमान में पाकिस्तान, बांग्लादेश और खाड़ी के कई देशों के अलावा कुछ दूसरे एशियाई देशों में इमरती बनाई, बेची और खाई जाती है, अधिकतर जगह इसके मूल में अवध ही बताया जाता है।

इतिहासकार बताते हैं कि मुगलों का राज दूर दूर तक था और उनके व्यापारी पूरे एशिया में अपने कारोबार के लिए आवागमन करते थे और उनकी ही वजह से यह मिठाई भरत के बाहर तमाम देशों में पहुंची।

विभाजन के बाद अवध के ढेरों लोग पाकिस्तान गए, कुछ बाग्लादेश भी पहुंचे सो इमरती वहां भी गई. लखनऊ में कुछ साल पहले तक कई दुकानें थीं और कुछेक तो आज भी हैं जो खासतौर पर इमरती ही बनाती हैं और अपनी इमरती के लिए दूर दूर तक जानी जाती हैं। 

दशक पहले लखनऊ के नरही,सदर और चौक की तंग सी गलियों में कई हलवाई मौजूद थे, जो महज इमरती ही बनाते और उसी के लिए जाने जाते थे भले ही उनकी दुकान छोटी थी पर वे मशहूर बड़े थे। 

कुछ दूकानें तो चौथी पीढ़ी के हाथ में हैं और उनके यहां इमरती बनाने का पुराना इतिहास है। इतिहासकारों ने अपने ब्योरों में कई बार उल्लेख किया है कि अवध में हिंदू राजाओं के बीच मिठाइयों का चलन बहुत आम रहा है। 

मिसठ्दंती कहे जाने वाले इन राजाओं के रसोइयों में हमेशा कुछ नया बनाने की होड़ लगी रहती थी। बाहर से आए व्यंजनों के साथ भी वे गज़ब का प्रयोग करते थे। 

हलवे को ही लीजिए अरब से आए हलवे ने भले ही मेवे की मिकदार कुछ ज्यादा हो और उसमें घी खूब पिलाई गई हो, पर हलवा पूड़ी वाला गीला हलवा और लपसी तो विशुद्ध रूप से अवधी परिमार्जन है। जमाना बहुत बदल गया पर आज भी सुबह के नाश्ते में हलवा-पूड़ी की बात कभी कभी होती ही है।

एक भ्रांति यह भी है कि तजुर्बे के तहत जलेबी को बेहतर बना कर उसी के आधार पर इमरती बनाई गई। भले ही देखने में कुछ समानता ढूंढ ली जाए पर यह दोनों भीतर बाहर से हर जगह से सूरत और सीरत दोनों में भिन्न हैं। 

माना जाता है कि जलेबी अरब से हिंदुस्तान आयी, कतिपय प्रमाण भी मौजूद हैं, पर जलेबी और इमरती न तो शक्ल में मिलती हैं न स्वाद में, इमरती का अभिजात्यपन जलेबी में कहां। इमरती की पेचीदगी भरी कलात्मकता तथा इसका बनाव बेहद उच्च स्तरीय है। 

अच्छी जलेबी हलकी गुलाबी और भूरी होने की हद तक और कुरकुरी तथा थोड़ी पतली होती है, इमरती की तरह नर्म नहीं। 

मैदे से बनने वाली जलेबी के विपरीत इमरती के लिये, उड़द की दाल को महीन पीस कर उसे खूब गूंथा जाता है। दाल से बनी होने के कारण इमरती चाशनी को विधिवत और पूरी तरह से सोख लेती है। 

जलेबी का एक प्रकार चोटहिया जलेबी भी है, यानी शीरा टपकता हुआ, पर इमरती की सांस्कृतिक अनुशासन तथा सुसभ्यता इसकी इजाजत नहीं देती। वह देखने में जलेबी की तुलना में बाहर से चिपचिपी नजर नहीं आती। 

जलेबी के शौकीन हैं आप, तो आप इसे कमतर कह लीजिए, लेकिन यह दरअसल जलेबी के मुकाबले खूबतर है, एक टुकड़ा खाते ही पता चल जाता है कि इमरती के भीतर मिठास किस तरह रची बसी है। 

जलेबी ठेलों पर भी मिल जाएगी, लेकिन इमरती बड़े ठसके के साथ मिठाइयों की अच्छी दूकानों पर ही सजी मिलेगी। जलेबी को बहुधा लोग दही के साथ खाते हैं, कई बार ह्ल्के गर्म दूध का इस्तेमाल भी करते हैं, कानपुर में सब्जी के साथ भी जलेबी खाते देखा जा सकता है। 

पर इमरती किसी के साथ भी जोड़ बना ले ऐसा नहीं है, वह या तो अकेले ही खाई जाती है या फिर रबड़ी के साथ। बहुत हुआ तो गाढे दूध के साथ। 

ढेरों महानगरों में जीवनशैली बदल जाने के चलते जलेबी का जलेबियां शाम को बनती हैं, पर असल में इनको सुबह नाश्ते में खाने की परंपरा रही है, अल्पाहार के साथ या उसके बतौर। पर इमरती खाने की परंपरा शाम देर शाम को पूरे ठहराव के साथ खाने की है। 

अब कहीं कहीं रात के भोजन के बाद खाने  का चलन डाल लिया गया है। अच्छे किस्म की रबड़ी और इमरती की भरी हुई प्लेट से एक हसीन शाम में मिलना आस्वाद का अलौकिक अनुभव है।

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