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साहित्य/संस्कृति


शोर-शराबे के दौर में भी है कथक की महत्ता : शोभना नारायण

पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता कथक नृत्यांगना शोभना नारायण युवाओं में कथक के प्रति आर्कषण को उम्मीद भरी नजरों से देखती हैं। उनका कहना है कि आजकल के शोर-शराबे वाले संगीत पर नृत्य के दौर में भी लोग हजारों साल पुरानी विधाओं को भूले नहीं हैं, बल्कि वह इसे काफी पसंद करते हैं


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पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता कथक नृत्यांगना शोभना नारायण युवाओं में कथक के प्रति आर्कषण को उम्मीद भरी नजरों से देखती हैं। उनका कहना है कि आजकल के शोर-शराबे वाले संगीत पर नृत्य के दौर में भी लोग हजारों साल पुरानी विधाओं को भूले नहीं हैं, बल्कि वह इसे काफी पसंद करते हैं। 

आज के समय में कथक को लेकर क्या माहौल है, इस पर प्रसिद्ध नृत्यांगना ने कहा, "बहुत अच्छा माहौल है। कथक एक बेहद पुरानी विधा है। यह ढाई हजार साल पुरानी है। महाभारत, मौर्य काल में इसका जिक्र देखने को मिलता है। लेकिन इतनी प्राचीन होने के बावजूद हर पीढ़ी के लोगों के बीच यह उतनी ही प्रशंसनीय है।

साल दर साल संगीत में आ रहे बदलाव को हम देख रहे हैं, लेकिन शोर-शराबे वाले संगीत पर नृत्य के बढ़ते चलन के बीच भी कथक ने अपनी पहचान खोई नहीं है। कथक की महत्ता बरकरार है।"

शोभना कथक के लिए कठिन परिश्रम और तपस्या को जरूरी मानती हैं। उन्होंने कहा, "यूं तो हर विधा को सीखने के लिए उसकी गहराई में जाना जरूरी है, लेकिन कथक के साथ कई चुनौतियां होती हैं। हर युग के कलाकार ने इस विधा को अपना खून-पसीना दिया है। यह किसी भी लिहाज से व्यावसायिक नहीं रही है।"

शोभना ने हाल ही में समाजसेवी संस्था चाइल्डफंड इंडिया के 'खिलता बचपन' अभियान में शिरकत की थी। इस अभियान के बारे में वह कहती हैं, "यह संस्था बच्चों के लिए बहुत अच्छा काम कर रही है।

यह बच्चों को पारंपरिक शिक्षा के साथ ही कला के क्षेत्र में प्रशिक्षित कर रही है और इसीलिए मैं इसका हिस्सा बनी। यह हर बच्चे की पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ रचनात्मक क्षमता को भी विकसित करने का काम कर रही है।" 

शोभना समाजसेवा के कार्यों में बहुत सक्रिय रहती हैं। उनका मानना है कि हर एक शख्स भले ही वह कोई सेलिब्रिटी हो या आम इंसान, उसे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। वह कहती हैं, "हमें जीवन और समाज ने बहुत कुछ दिया है, इसलिए हमारा दायित्व है कि हम अपनी-अपनी जगह और स्थिति के अनुसार जीवन और समाज के लिए अपना योगदान दें।

हमें लेना ही नहीं, देना भी आना चाहिए। उदाहरण के लिए अगर आप कोई पौधा सींचते हैं तो उससे आपको फल भी मिलता है। वह पौधा खुद उस फल का इस्तेमाल नहीं करता है, बल्कि आप ही उसका इस्तेमाल करते हैं। आपने जो हासिल किया, उसे बांटने की खुशी अलग होती है।"
 

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