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राजनीति


गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण के रास्ते में राजनीतिक पेचीदगियां तो हैं ही, लेकिन क़ानूनी बंदिशें बहुत अधिक हैं!

यदि संसद अपनी संविधान संशोधन की शक्ति के ज़रिए आर्थिक पिछड़ेपन को भी आरक्षण का लाभ प्रदान करने का पैमाना बनाएगी, तो उसकी विधि का सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्याओं के साथ टकराव होगा। उच्चतम न्यायालय ही संविधान का रक्षक है। ज़ाहिर है कि ऐसे किसी भी संविधान संशोधन को न्यायालय में चुनौती दी जाएगी


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केंद्रीय कैबिनेट ने यह निर्णय लिया कि देश के आर्थिक तौर पर कमज़ोर सवर्णों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दस फ़ीसदी आरक्षण देने के लिए संविधान में संशोधन किया जाएगा। सरकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 (4) और 16 (4) में संशोधन कर आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण देने का रास्ता साफ़ करना चाहती है।

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार की यह पहल सवर्ण जातियों में पनपे उस कथित ग़ुस्से को शांत करने की कोशिश मानी जा रही है, जो एससी-एसटी एक्ट में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किए गए बदलाव को क़ानून के ज़रिए पलटने से पैदा हुआ है।

तीन राज्यों के चुनावी नतीज़ों के बाद मोदी सरकार यह क़दम उठा रही है। कई राजनीतिक विश्लेषक यह मान रहे हैं कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा की हार का एक कारण उसके परम्परागत सवर्ण वोटरों का उससे छिटकना भी है।

ज़ाहिर है कि लोकसभा चुनाव में ऐसे किसी सम्भावित नुक़सान से बचने के लिए भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने यह अप्रत्याशित पहल की है। राजनीतिक पहलकदमियां तो अपनी जगह हैं।

लेकिन हमें यह देखना चाहिए कि संवैधानिक तौर पर ऐसा करना किस हद तक मुमकिन है। दरअस्ल, हमारे संविधान में आरक्षण के दो द्वार हैं। एक, संविधान के भाग-16 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।

इसके तहत इन वर्गों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 22.5 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। इसके अलावा इन वर्गों के लिए विधानमण्डलों में 33 फ़ीसदी सीटें आरक्षित की गई हैं। इन वर्गों के लिए यह विशेष प्रावधान संविधान लागू होने के समय से ही है।

दूसरा, भारतीय संविधान के भाग तीन में राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े हुए वर्गों को आरक्षण देने की शक्ति दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 15 (4) और 16 (4) के मुताबिक़, सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए राज्य विशेष क़दम उठा सकता है।

जनता पार्टी की सरकार द्वारा गठित मण्डल आयोग ने इसी प्रावधान के तहत सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27 फ़ीसदी आरक्षण देने की सिफ़ारिश की थी। मण्डल आयोग की इस सिफ़ारिश को वीपी सिंह सरकार ने लागू किया था। वीपी सिंह सरकार के इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई।

इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1993), जिसे हम मण्डल केस के नाम से भी जानते हैं, के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अन्य पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के निर्णय को सही माना। इसके साथ ही इस बहुचर्चित मामले में न्यायालय ने कुछ अन्य व्यवस्थाएं भी दीं। उन व्यवस्थाओं के प्रकाश में मोदी सरकार की इस ताज़ा पहल को देखना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि जाति के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। किसी भी वर्ग को उसके सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर ही विशेष अवसर का लाभ मिलना चाहिए। लेकिन अदालत ने जाति को सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को मापने का पैमाना  ज़रूर मान लिया।

इसका मतलब है कि जो जातियां सोशली और एजुकेशनली बैकवर्ड हों, उन्हें ही आरक्षण का लाभ मिल सकता है। यदि सरकार सवर्ण जातियों को भी आरक्षण का लाभ देना चाहती है, तो उसे इन जातियों का इस प्रकार का पिछड़ापन साबित करना चाहिए। ज़ाहिर है कि सवर्ण जातियां सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़ी हुई नहीं है। लेकिन सरकार उन्हें आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर रिज़र्वेशन का लाभ प्रदान चाहती है।

मण्डल केस में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर भी आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। केएस जयश्री बनाम केरल राज्य और छोटे लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामलों में अपने पूर्व में दिए निर्णयों में भी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि केवल जाति या केवल निर्धनता को आरक्षण का लाभ प्रदान करने के लिए पिछड़ेपन का पैमाना नहीं बनाया जा सकता है। अतः यह साफ़ है कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर ही किन्हीं जातियों या वर्गों को रिज़र्वेशन मिल सकता है।

यदि संसद अपनी संविधान संशोधन की शक्ति के ज़रिए आर्थिक पिछड़ेपन को भी आरक्षण का लाभ प्रदान करने का पैमाना बनाएगी, तो उसकी विधि का सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्याओं के साथ टकराव होगा। उच्चतम न्यायालय ही संविधान का रक्षक है। ज़ाहिर है कि ऐसे किसी भी संविधान संशोधन को  न्यायालय में चुनौती दी जाएगी।

इसके अलावा इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की नीति पर एक और सीमा आरोपित की। न्यायालय ने यह स्पष्ट व्यवस्था दी कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं होनी चाहिए और हर हाल में पचास प्रतिशत सीटों को अनारक्षित रखा जाना चाहिए।

उसके बाद कई सरकारों के आरक्षण के नियमों को सर्वोच्च न्यायालय ने इस आधार पर असंवैधानिक घोषित किया है कि उस नियम के ज़रिए आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत के पार जा रही थी।

अब सरकार इस पचास प्रतिशत की सीमा के बाहर सवर्ण जातियों को आर्थिक आधार पर दस फ़ीसदी आरक्षण देने की बात कर रही है। इस आधार पर भी संसद के इस संभावित क़ानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी। अंततोगत्वा यही निष्कर्ष निकलता है कि मोदी सरकार के इस क़दम के रास्ते में राजनीतिक पेचीदगियां जो हों, लेकिन क़ानूनी बंदिशें बहुत ज़्यादा हैं।

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