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फीचर


जिनका अपना कोई नहीं, उनका भी है हक! देश में दो करोड़ बच्चे बेघर

दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने कहा था, "सुरक्षा और बचाव अनायास मिलने की चीज नहीं है, बल्कि इस दिशा में आम सहमति और सार्वजनिक निवेश के साथ काम करने से ये परिणाम मिलते हैं। इसलिए यह हमारी जिम्मेदारी है कि बच्चों को, जो समाज के सबसे कमजोर नागरिक होते हैं उन्हें हिंसा और भय मुक्त जीवन दें


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दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने कहा था, "सुरक्षा और बचाव अनायास मिलने की चीज नहीं है, बल्कि इस दिशा में आम सहमति और सार्वजनिक निवेश के साथ काम करने से ये परिणाम मिलते हैं। इसलिए यह हमारी जिम्मेदारी है कि बच्चों को, जो समाज के सबसे कमजोर नागरिक होते हैं उन्हें हिंसा और भय मुक्त जीवन दें।" 

भारत में दो करोड़ से अधिक बच्चे बिन मां-बाप के हैं या छोड़ दिए गए हैं। उन्हें अपना कहने वाला कोई नहीं है। इन्हें भी एक छत का अधिकार है जो इन्हें खतरों और आतंक से सुरक्षित रखे। 

हर एक बच्चे को जीने का बराबर हक मिलना चाहिए। पूरी दुनिया में लाखों बच्चे कई पीढ़ियों से अभाव की जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं और बच्चों का भविष्य और उनके साथ पूरे समाज का भविष्य खतरों में है।

बाल-शोषण हमारे देश की नई महामारी बन गई है, जिसका समाधान अधिक जिम्मेदारी और गंभीरता से करना होगा। हालांकि हमारे देश में बच्चों की देखभाल के कई संस्थान हैं, जो इस दिशा में काम कर रहे हैं, पर बड़ा और सबसे ज्वलंत मुद्दा यह है कि उनमें से कितने रजिस्टर्ड हैं और कितनों के पास बच्चों को सुरक्षित और संपूर्ण बचपन देने का प्रोग्राम है?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों ऐसे संस्थानों की वैधता की जांच नहीं की जा रही है। इन तमाम सवालों के साथ आज यह समझना जरूरी है कि इस मसले को गंभीरता से लेना होगा।

बाल देखभाल संस्थानों के लिए एसओपी :

भारतीय संविधान बच्चों को कानून की नजर में बराबर होने का अधिकार सुनिश्चित करता है। राज्य सरकारों को बच्चों की सुरक्षा के लिए मजबूत नीतियां बनाने की जिम्मेदारी दी गई है, ताकि सभी बच्चों को सुरक्षित परिवेश मिले जो खास कर कमजोर तबके के बच्चों के लिए बेहद जरूरी है।

बच्चों पर केंद्रित कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू करने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है मानक परिचालन प्रक्रिया का निर्धारण, ताकि बच्चों की सुरक्षा और बचाव सुनिश्चित हो। खासकर देश में कार्यरत सभी बाल देखभाल संस्थानों के लिए यह अनिवार्य होगा। 

एसओपी का लक्ष्य बच्चों से जुड़े विभिन्न कानूनों के दायरे में आने वाले प्रत्येक कैटेगरी के बच्चों के लिए एक मानक परिचालन प्रक्रिया का निर्धारण करना है। आज ऐसे कई कानून हैं, जैसे जुवेनाइल जस्टिस (देखभाल एवं सुरक्षा) एक्ट 2015, पीओसीएसओ 2012, बाल श्रम कानून 1986, शिक्षा अधिकार कानून 2009, बाल विवाह कानून, मानसिक स्वास्थ्य, आईसीपीएस और बच्चों के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना का ड्राफ्ट 2016 आदि। 

पूरे देश में कार्यरत सीसीआई के लिए विभिन्न कानूनों और उनके प्रावधानों का अनुपालन करना अनिवार्य है और यह भी समझना होगा कि ऐसे सभी संस्थान इन कानूनों के अनुपालन के लिए बाध्य हैं। सीसीआई के बच्चों के लिए परिसर में ही औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। उन्हें किसी पेशे और अन्य व्यवसायों के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

उनकी बुनियादी जरूरतों जैसे भोजन, स्वच्छता के लिए जरूरी चीजें, बिस्तर, कपड़े, किताबें और दैनिक उपयोग की अन्य चीजें उपलब्ध कराई जाए। जरूरत हो तो चिकित्सा की भी सुविधा हो। साथ ही, यह देखना होगा कि वे स्वस्थ परिवेश में रहें। 

पंजीकरण से से क्यों बचते हैं सीसीआई?

देश में 2,000 से अधिक सीसीआई हैं जो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बार-बार चेतावनी देने के बावजूद सरकार में खुद को पंजीकृत नहीं करा रहे हैं। केवल तिरुवनंतपुरम में ऐसे 280 सीसीआई ने काम बंद कर दिया, जब महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने जेजे एक्ट नहीं लागू करने के लिए उन पर शिकंजा कस दिया।

इसलिए सभी सीसीआई के लिए यह जरूरी है कि कानून के क्लॉजों पर अमल करें, जिनमें कुछ सुविधाएं देना अनिवार्य किया गया है। जैसे कि आश्रय लेने वाले बच्चों को न्यूनतम 40 वर्गफुट जगह देना और सुनिश्चित संख्या में (हर 10 बच्चे पर 1) वार्डन नियुक्त करना आदि। 

केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे एक महीने के अंदर सभी सीसीआई का रजिस्टर्ड होना सुनिश्चित करें और यह भी कि ये गोद लेने संबंधी केंद्र के सर्वोच्च संगठन केंद्रीय गोद संसाधन प्राधिकरण (सीएआरए) से जुड़ जाएं। 

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय को भी खुल कर यह कहना पड़ा कि सीसीआई को रजिस्ट्रेशन कराना होगा और नाकाम रहने पर सजा भी होगी। रजिस्ट्रेशन नहीं होने की जो वजहें अक्सर बताई जाती हैं, उनमें मुख्य रूप से कहीं-न-कहीं राज्य सरकार की इच्छाशक्ति का अभाव और वित्त सुविधाओं की कमी है। 

हमारे देश में बिन मां-बाप के बच्चों या बेघर बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के लिए नीतियां और कानून उपलब्ध हैं। लेकिन सही अर्थों में उनका अनुपालन होता नहीं दिखता है। पूरी दुनिया मानती है कि परिवार और परिवार-जैसे परिवेश में रहने वाले बच्चे जीवन की मुख्यधारा से जुड़ने और समाज में योगदान देने की जिम्मेदारियां बेहतर निभा सकते हैं जो न केवल आर्थिक और भावनात्मक और समाजिक मानकों पर देखा गया है।

इसलिए बेहतर होगा कि देखभाल की गैर-संस्थानिक व्यवस्था जैसे कि किनशिप केयर, फोस्टर केयर या अन्य रूप में परिवार के माहौल में देखभाल सुनिश्चित किया जाए। किसी संस्थान की तुलना में परिवार जैसी देखभाल को प्राथकिमता देना उचित होगा। 

राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग के आंकड़े बताते हैं कि देश में रजिस्टर्ड और अनरजिस्टर्ड कुल मिलाकर सभी सीसीआई में 2,32,937 बच्चे हैं। आंकड़ों से यह भी सामने आया है कि 1339 अनरजिस्टर्ड चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूट में केवल केरल में 1165 हैं। इस राज्य में रजिस्टर्ड सीसीआई की संख्या 26 है।

आंकड़ों के अनुसार, 11 जुलाई तक पूरे देश में रजिस्टर्ड सीसीआई की संख्या 5850 हैं और अनरजिस्टर्ड की गिनती करें तो यह संख्या कुल मिलाकर 8000 से अधिक होगी। केरल के अतिरिक्त कुछ अन्य राज्यों में भी अनरजिस्टर्ड सीसीआई हैं। इनमें महाराष्ट्र में 110, मणिपुर में 13, तमिलनाडु में 9, गोवा में 8, राजस्थान में 4 और नगालैंड में 2 ऐसे बाल आश्रय हैं।

हमारे देश में बच्चों की देखभाल के अन्य वैकल्पिक मॉडलों की जरूरत है जो देखभाल में गुणवत्ता के लिए प्रतिबद्ध हों। विचारों और कार्य प्रक्रियों का आदान-प्रदान भी जरूरी है, क्योंकि इससे हमारा दृष्टिकोण व्यापक होगा। 

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