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संपादकीय


अपराध, राजनीति और धर्म का यह “किलर कॉकटेल” बेहद घातक साबित होगा

लव जेहाद के प्रबल विरोधकर्ता रैगर के साथ ही बिसहड़ा के बहुचर्चित अखलाक कांड का आरोपी हरिओम सिसौदिया गौतमबुद्ध नगर से लड़ेगा तय हो गया है। रामनवमी में रैगर की शोभायात्रा निकाली ही जा चुकी है, गौरक्षा के मामले में सिसौदिया को अग्रदूत बना कर पेश किया जाने वाला है


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राजनीति और अपराध के गठजोड़ को खत्म करने उसके अपराधीकरण को रोकने के बारे में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला अगर कोई उत्साह जगाने में नाकाम रहा, तो यह परिदृश्य तो और भी विकट तथा निराशाजनक है। पर्याप्त प्रतिरोध के अभाव में अपराध, राजनीति और धर्म का यह “किलर कॉकटेल” भविष्य में बेहद घातक साबित होगा।

शंभूलाल रैगर 2019 के चुनावों में आगरा सीट से प्रत्याशी होगा। शंभूलाल रैगर ने एक मुस्लिम युवक को मार कर न सिर्फ जला डाला था बल्कि अपने कृत्य का वीडियो भी बनवाया था और वह सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, उसे ख्याति की प्राप्ति हुई और परिणाम स्वरूप पार्टी विशेष ने उन्हें जनप्रतिनिधि बनने के सर्वथा योग्य समझा।

लव जेहाद के प्रबल विरोधकर्ता रैगर के साथ ही बिसहड़ा के बहुचर्चित अखलाक कांड का आरोपी हरिओम सिसौदिया गौतमबुद्ध नगर से लड़ेगा तय हो गया है। रामनवमी में रैगर की शोभायात्रा निकाली ही जा चुकी है, गौरक्षा के मामले में सिसौदिया को अग्रदूत बना कर पेश किया जाने वाला है।

इस तरह की योग्यता विशेष वाले प्रत्याशियों का चयन और उन्हें चुनावी मैदान में उतारना भारतीय राजनीति की एक नयी धारा और अलग रणनीति की बानगी है। फिलहाल तो उत्तर प्रदेश की नवनिर्माण सेना ने सूबे की महज पांच सीटों, मथुरा, आगरा, फिरोजाबाद, नोयड़ा, अलीगढ पर ही अपनी पार्टी के उम्मीदवार खड़ा करने की घोषणा की है।

पार्टी प्रमुख का मथुरा से लड़ना तय माना जा रहा है, आगरा से शंभूलाल रैगर हैं और गौतमबुद्ध नगर से हरिओम सिसौदिया। कुल मिला कर उसको अभी इसी तरह के दो प्रत्याशी और चुनने हैं। तलाशने नहीं क्योंकि ऐसी योग्यता रखने वाले प्रत्यशियों की विगत कुछ बरसों में भरमार सी हो गई है।

राजनीति में सुनहरा अवसर देखते हुए ऐसे ही दूसरे संभावित प्रत्याशियों के मन में भी जनहित, समाज सेवा, धर्म कार्य, राष्ट्रसेवा की उत्कट अभिलाषा जोर मार सकती है। उन्हें निर्दल के बतौर मैदान में उतरने से नहीं रोका जा सकता पर नवनिर्माण सरीखे कई संगठन हैं, राजनीतिक दल हैं जो इन्हें लांच करने में गुरेज नहीं बल्कि फख्र और बेहतर मौका महसूस करेंगे।

यह स्थिति कहां तक जाएगी कल्पनातीत है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस तर्ज पर काम करने वाले कई संगठन मौजूद हैं। हत्या आरोपियों को चुनाव लड़वाने वाली पार्टी जिस तार्किक आधार पर अपने प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतार रही है, वह राजनीति का पुराना तर्क है। जब तक आरोप सिद्ध न हो जाये किसी को भी माननीय बनने के अवसर और अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

जब दूसरे हत्या आरोपी चुनावी मैदान में आ सकते हैं, तो रैगर क्यों नहीं। उसे भाजपा के कतिपय नेताओं के उस उदाहरण से भी समुचित बल मिलता है कि सबसे बड़ी मॉब लिंचिंग तो सिख दंगे थे, जब उसके आरोपी चुनाव लड़ सकते हैं तो हरिओम सिसौदिया क्यों नहीं। अब चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय इन दलीलों का स्वयं संज्ञान ले तो कोई बात बने।

हालांकि ऐसी पार्टियां सरकार विरोधी रुख अख्तियार करते हुए कहती हैं कि वह राम मंदिर नहीं बना पाई, 370 नहीं हटवा पाई, न पत्थरबाजों पर रोक लगी न रोमियो पर अंकुश। वे यह प्रचारित करती फिर रही हैं कि सभी सरकारें मुस्लिम तुष्टीकरण करती हैं, यह सरकार भी।

पर दरअसल इनका भाजपा छोड़ कोई और दर नहीं। इनका भाजपा के खिलाफ होना महज एक दिखावा है। वे उन कट्टर मतदाताओं को कहीं और भटकने से रोकने, उलझाने का उपक्रम है जो भाजपा को राजनीतिक मजबूरियों के चलते प्रखर और आक्रामक हिंदुत्व का कार्ड न खेलने की मजबूरी से खफा हैं, किसी विरोधी की तरफ जा सकते हैं, विमुख हो सकते हैं।

कुल मिलाकर ये पूरक इकाइयां हैं, जो अपने दम पर उनके लिए कट्टर हिंदू कार्ड खेलने को तैयार हैं, उत्तरप्रदेश नव निर्मण सेना का कोई प्रत्याशी जीत कर लोकसभा पहुंचेगा यह संभव नहीं लगता। इससे राजनीति की दशा-दिशा में कोई व्यापक बदलाव आएगा अथवा क्षेत्र विशेष में भी कोई स्थाई प्रभाव पड़ने वाला है ऐसा भी नहीं।

लेकिन ये पार्टियां विघटनकारी ताकतों को आगे लायेंगी, मजबूत करेंगी। दंगे फसाद जैसा वैमनस्य का माहौल निर्मित करेंगी, हिंदू अस्मिता और संकट के अपने कुतर्कों के बल पर सामाजिक और राजनीतिक माहौल को संदूषित करेंगी। यह सारा माहौल एक विशेष तरह के भय और ध्रुवीकरण को जन्म देगा।

उनकी सोच के मुताबिक लगता है कि यह सब कुछ हिंदू हित की बात करने वाली भाजपा के लिये मुफीद होगा। वे प्रधानमंत्री के उस जुमले से प्रभावित लगती हैं कि जितना कीचड़ होगा उतना ही कमल खिलेगा। हिंदू जितना संगठित होगा उतना ही सियासी फायदा भाजपा को होगा और उनकी भी सियासी  मोलभाव की ताकत और पकड़ बनी रहेगी।

बेशक राजनीतिक सियासी और खास और पर दांव पेच में बहुत से तरीके अपनाये जाते हैं पर अनुमान लगाया जा सकता है कि देश समाज के प्रति सरोकार रखने वाली भाजपा जैसी पार्टी इस तरह के तौर तरीकों से कतई सहमत नहीं होगी। सो सरकार को चाहिये कि वह इस तरह के क्रियाकलापों पर खुल कर विरोध जताये जिसके छींटे उसके दामन तक पहुंचते हों।

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