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साहित्य/संस्कृति


कैफ़ी आज़मी | 20 वीं सदी के सबसे महान शायरों में से एक

कैफ़ी साहब ने सिर्फ 19 साल की उम्र में कम्यूनिस्ट पार्टी ज्वाइन कर ली थी और उसके अखबार के लिए लिखने लगे थे। लेकिन तबियत से आम आदमी के रहनुमा कैफ़ी साहब अपनी अधिकतर कमाई पार्टी को ही दान कर देते थे


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मैं ढूँढता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमाँ नहीं मिलता

नई ज़मीं नया आसमाँ भी मिल जाये
नये बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता

वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता

वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ
यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलता

खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता

इन 12 पंक्तियों को गौर से पढ़े तो जैसे इसके रचियता ने जिंदगी का हर पहलू चंद लाइनों में समेट के रख दिया है। हर एक शब्द में गहरे तक घुले हुए दर्द की बानगी के साथ इंसानी जज्बात करीने से कहे गए हैं। ऐसी ज़हीन बातें सिर्फ चंद शब्दों में कहने वाले शायर का नाम है - कैफ़ी आज़मी। आज उनकी पुण्यतिथि है। 

गजलों से लेकर फिल्मों के गीत तक  कैफ़ी आज़मी ने जो कुछ लिखा, सब आम आदमी की दास्तान थी। उनके शब्दों में आम लोगों के रूमानी लहजे से लेकर आम लोगों का दर्द महसूस होता है। शायद इसी वजह से तबियत से वह कामरेड हो गए थे। 

उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले में एक छोटा सा गांव है, नाम है मिजवां। इसी गांव में इस बीसवीं सदी के सबसे महान शायरों में से एक का 14 जनवरी 1919 को जन्म हुआ था। वैसे उनका  नाम अख्तर हुसैन रिज़वी था, लेकिन बाद में उन्होंने अपने शहर के नाम को ही अपना तखल्लुस बना लिया और कैफ़ी आज़मी हो गए। 

सिर्फ 11 साल की उम्र में ही कैफ़ी साहब ने एक गज़ल लिख दी थी, गज़ल में इतनी गहराई थी कि लोगों को यकीन ही नहीं हुआ कि यह गज़ल इतनी कम उम्र का कोई बच्चा लिख सकता है। लेकिन बाद में जब कैफ़ी साहब के घरवालों ने बताया तो पता चला कि यह गज़ल सच में कैफ़ी साहब की ही लिखी हुई थी। 

गजल थी - "इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े, हँसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े।" बाद में इस गज़ल को बेगम अख्तर ने गाया भी।

कैफ़ी साहब ने सिर्फ 19 साल की उम्र में कम्यूनिस्ट पार्टी ज्वाइन कर ली थी और उसके अखबार के लिए लिखने लगे थे। लेकिन तबियत से आम आदमी के रहनुमा कैफ़ी साहब अपनी अधिकतर कमाई पार्टी को ही दान कर देते थे। 

बाद में एक दिन उनतक मशहूर निर्देशक चेतन आनंद पहुंचे और उनसे लिखने का आग्रह किया। फिल्म बनी - ‘हकीकत’ और इसके गाने लिखे कैफ़ी साहब ने। फिर क्या था, रातोंरात फिल्म के गाने इतने मशहूर हुए कि कैफ़ी साहब फ़िल्मी दुनिया के सबसे बड़े गीतकारों में से एक हो गए। फिल्म के गानों - 'होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा', 'कर चले हम फ़िदा जां वतन साथियों', 'जरा सी आहट होती है तो दिल सोचता है' लोगों की जुबां पर चढ़ गए।

उसके बाद उन्होंने 'कागज के फूल', 'सात हिन्दुस्तानी', 'बावर्ची', 'पाकीज़ा', 'हँसते ज़ख्म', 'रज़िया सुल्तान' जैसी प्रसिद्द फिल्मों के बेहद मशहूर गीत लिखे। उनकी शख्सियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके समकालीन जितने भी बड़े शायर थे, चाहे फिराक गोरखपुरी हों या जोश मलीहाबादी या फैज अहमद फैज या साहिर लुधियानवी या मजरूह सुल्तानपुरी, सबसे उनकी दोस्ती थी और सब उनका एहतराम करते थे।

कैफ़ी साहब आम आदमी और समाज के हर तबके से किस हद तक जुड़े थे इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब उनकी बेटी और प्रसिद्द अभिनेत्री शबाना आज़मी छोटी थीं तो उन्होंने अपने अब्बा से एक दिन गुड़िया लाने की जिद की। जानते हैं, कैफ़ी आज़मी ने क्या किया, लीक से हटकर अपनी बेटी के लिए काली गुड़िया लेकर आये। और अपनी बेटी को समझाया कि काला रंग भी सुन्दर हो सकता है।

पूरी दुनिया, पूरी पीढ़ी या एक रेस के लिए यह बहुत बड़ा संदेश था जिसे कैफ़ी साहब हमेशा से देते आ रहे थे। बकौल शबाना आज़मी अपने अब्बा के इस संदेश को वह कभी नहीं भूलीं। 'औरत' और 'मकान' जैसी अपनी नज्मों से दुनिया को कैफ़ी साहब ने सामाजिक संदेश के साथ-साथ सच्चाई से भी रूबरू करवाया।

कैफ़ी साहब ने गीत लिखने के आलावा फिल्मों के संवाद भी लिखे हैं। फिल्म 'हीर रांझा', जिसके संवाद भी कविता के लहजे में लिखे और बोले गए, के संवाद कैफ़ी साहब ने ही लिखे थे। साथ ही मशहूर फिल्म 'गर्म हवा' के लिए संवाद से लेकर कहानी और पटकथा तक सब कैफ़ी साहब ने ही लिखा था।

कैफ़ी साहब को फिल्म 'सात हिन्दुस्तानी' के गानों के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके आलावा साहित्य में उनके योगदान के लिए 'साहित्य अकादमी अवार्ड' और भारत सरकार की तरफ से 'पद्मश्री' से भी नवाजा गया। वहीं फिल्म 'गर्म हवा' के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से भी नवाजा गया।

एनटीआई परिवार की तरफ से आम आदमी के इस शायर को भावभीनी श्रद्धांजलि।

चलते चलते उनकी इस गज़ल को एक बार पढ़ लें जिसे जगजीत सिंह ने अपनी कशिश भरी आवाज से भी नवाजा है, हर इंसान की जिंदगी के दर्द को बेहतर रूमानी तरीके से महसूस कर पायेंगे।

कोई ये कैसे बताये कि वो तन्हा क्यों है ? 
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों है ? 
यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यों है ? 
यही होता हैं तो आखिर यही होता क्यों है ? 

एक ज़रा हाथ बढ़ा दे, तो पकड़ ले दामन 
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन 
इतनी कुर्बत हैं तो फिर फ़ासला इतना क्यों है ? 

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई 
एक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई 
आस जो टूट गयी फिर से बंधाता क्यों है ? 

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता 
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता 
हैं जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यों है ? 

 

 

 

 

 

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