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साहित्य/संस्कृति


श्रद्धांजलि | वीएस नायपॉल: सभ्यता विमर्श का उत्तर आधुनिक सूत्रधार

‘ए फ्लैग अॉन द आइलैंड’ (1967),  ‘इन ए फ्री स्‍टेट’ (1971), ‘ए वे इन द वर्ल्ड’ (1994), ‘हॉफ ए लाइफ’ (2001) और ‘मैजिक सीड्स’ (2004) जैसी कृतियों के लेखक वीएस नायपॉल ने नोबेल से लेकर बुकर तक कई सम्मान अपने पचास साल से लंबे लेखन में पाए


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विद्याधर सूरज प्रसाद नायपॉल यानी वीएस नायपॉल भारतवंशी थे। पर भारत को लेकर उनके विचारों को लेकर, भारतीय प्रबुद्ध वर्ग हमेशा चकित-भ्रमित रहा। आज जब नायपॉल हमारे बीच नहीं हैं, तो उनके लेखन संसार को लेकर एक समग्र आलोचकीय विवेक के साथ काफी कुछ लिखा-कहा जा रहा है।

दिलचस्प है कि अपने लंबे यात्रा-वृतांतों और उपन्यासों के कारण जाने गए नायपॉल पहली बार विश्व साहित्य में चर्चा में भी आए, तो वह भारत के कारण ही। 1961 में उनका चौथा उपन्यास आया था- ‘ ए हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास’। यह औपन्यासिक वृतांत था तो त्रिनिदाद का। पर कहानी का एक आंतरिक सिरा भारत से भी गहरे तौर पर जुड़ा था।

दिलचस्प है कि नायपॉल के पूर्वज गोरखपुर से त्रिनिदाद पहुंचे थे। ये लोग गिरमिटिया मजदूरी करने त्रिनिदाद ले जाए गए थे। वहां उनसे गन्ने के खेतों में काम लिया जाता था। इस उपन्यास का मुख्य चरित्र नायपॉल के पिता की जिंदगी से काफी प्रभावित है। नायपॉल के पिता भी रचनात्मक लेखन में आगे बढ़ना चाहते थे।

पर प्रवासी जिंदगी की त्रासदी ने उन्हें मन की करने के बजाए बेमन का सहने के लिए विवश किया। दरअसल, आज अगर नायपॉल पूरी दुनिया में पढ़े जाते हैं, तो अपनी इन्हीं रचनात्मक संवेदनाओं के कारण जिसमें एक तरफ युद्ध और औपनिवेशिक अन्याय का बड़ा वितान है, तो वहीं दूसरी तरफ युद्ध पीड़ितों के साथ उन लोगों की पीड़ा है, जिन्हें इन्हीं वजहों से अपना देश छोड़ना पड़ा।

वरिष्ठ अनुवादक और आलोचक हरीश त्रिवेदी ने उन्हें ‘भारत से निर्मम ममता रखने वाला लेखक’ बताया है। वह जब भी भारत की बात करते थे तो वे इसे बस एक भौगौलिक और राजनीतिक इकाई मानने को तैयार नहीं होते थे।

उनकी नजर में भारत एक सभ्यता है, एक सघन संस्कृति है, जिसने अपने सर्वाइवल के लिए कई तरह की यातनाएं झेलीं। जो गिरमिटया इन यंत्रणाओं के कारण विदेश पहुंचे आज उनके उद्यम और उपलब्धि पर हम भले नाज करें, पर यह नाज कई सवालों को जन्म देता है।

पहला और सबसे सवाल तो यह कि भारत की बहुलता में यह उदारता कैसे कम होती चली गई कि वह तारीख में कई मौकों पर अपनों के लिए ही दामन समेटने लगी। इतिहास में इसके एक नहीं कई उदाहरण हैं।  

भारतीय समाज और यहां विकसित हुई आधुनिक संस्कृति का सामना करने को नायपॉल के न रहने पर भी भारत में कम ही लोग तैयार होंगे। पर यही नायपॉल की प्रासंगिकता और विलक्षणता है कि वह दुनिया में एक नए तरह का सभ्यता विमर्श आगे बढ़ाते हैं।

इस विमर्श के केंद्र में भारत है तो साथ ही यरोप और मध्य पूर्व के देश भी शामिल हैं। इस विमर्श ने पूरी दुनिया में उत्तर आधुनिक चिंतन को कई स्तरों पर झकझोरा है।

विकास और उपलब्धि के जिन पैमानों पर आज हम विभिन्न देशों के सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व को आंकते हैं, नायपॉल उस पूरे स्केल को ही खतरनाक मानते हैं। स्केल का यह खतरा आज भारत में कितना है, इसे बताने की जरूरत नहीं।

‘ए फ्लैग अॉन द आइलैंड’ (1967),  ‘इन ए फ्री स्‍टेट’ (1971), ‘ए वे इन द वर्ल्ड’ (1994), ‘हॉफ ए लाइफ’ (2001) और ‘मैजिक सीड्स’ (2004) जैसी कृतियों के लेखक वीएस नायपॉल ने नोबेल से लेकर बुकर तक कई सम्मान अपने पचास साल से लंबे लेखन में पाए।

पर उनका सबसे बड़ा सम्मान वह नया पाठक समाज है, जिसने नए कलेवर के साहित्य को अपनी स्टडी टेबल पर जगह देनी जरूरी समझा। इस पाठक समाज के लिए नायपॉल हमेशा अपनी कृतियों में जीवित रहेंगे, संवादरत रहेंगे।

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