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आरबीआई और सरकार के बीच टकराव की क्या है मुख्य वजहें, क्यों सरकार ने आरबीआई की स्वायत्तता को महत्वपूर्ण बताया?

"सरकार ने कभी भी उन विचार-विमर्श के मुद्दों को सार्वजनिक नहीं किया। केवल अंतिम निर्णय के बारे में लोगों को बताया जाता है। सरकार इन विचार-विमर्शो के जरिए मुद्दों पर अपना मूल्यांकन करती है और संभावित उपाय के बारे में सलाह देती है। सरकार लगातार ऐसा करना जारी रखेगी" 


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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और सरकार के बीच स्वायत्तता और विभिन्न मुद्दों को लेकर तनातनी उफान पर है। तनातनी के बीच वित्त मंत्रालय ने बुधवार को कहा कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता 'एक महत्वपूर्ण और शासन चलाने के लिए स्वीकार्य जरूरत' है। जबकि पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने सरकार और आरबीआई के टकराव पर चिंता जताई है।

सरकार की तरफ से यह बयान उन खबरों के बीच आया है, जिसमें कहा गया है कि सरकार ने आरबीआई अधिनियम की धारा 7 को लागू किया है।

वित्त मंत्रालय की ओर से जारी बयान के अनुसार, सरकार और आरबीआई दोनों को सार्वजनिक हित और भारतीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों के हिसाब से काम करना है।

बयान में कहा गया है, "इस उद्देश्य के लिए कई मुद्दों पर समय-समय पर सरकार और आरबीआई के बीच व्यापक विचार-विमर्श हुए हैं।"

वित्त मंत्रालय ने कहा, "सरकार ने कभी भी उन विचार-विमर्श के मुद्दों को सार्वजनिक नहीं किया। केवल अंतिम निर्णय के बारे में लोगों को बताया जाता है। सरकार इन विचार-विमर्शो के जरिए मुद्दों पर अपना मूल्यांकन करती है और संभावित उपाय के बारे में सलाह देती है। सरकार लगातार ऐसा करना जारी रखेगी।" 

सरकार अर्थव्यवस्था से जुड़े तथ्यों को छिपा रही : चिदंबरम

चिदंबरम ने बुधवार को उन खबरों पर पर चिंता जताई है, जिसमें कहा जा रहा है कि केंद्र ने आरबीआई एक्ट की धारा 7 का इस्तेमाल कर केंद्रीय बैंक को निर्देश जारी किए हैं। चिदंबरम ने कहा कि यह दिखाता है कि सरकार हताश है और अर्थव्यवस्था से जुड़े तथ्यों को छिपा रही है।

चिदंबरम ने ट्वीट कर कहा, "अगर सरकार ने आरबीआई एक्ट की धारा 7 का इस्तेमाल कर आरबीआई को अप्रत्याशित निर्देश दिए हैं तो मुझे डर है कि आज और बुरी खबरें आएंगी।"

उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार ने 1991 या 1997 या 2008 या 2013 में धारा 7 का इस्तेमाल नहीं किया था। 

सीबीआई के बाद अब आरबीआई की बारी : यशवंत सिन्हा

पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने भी मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए सरकार पर देश के सभी संस्थानों को बर्बाद करने का आरोप लगाया।

भाजपा के पूर्व नेता ने ट्वीट कर कहा, "सीबीआई के बाद अब आरबीआई की बारी है। सरकार देश के सभी संस्थानों को तबाह करने पर तुली हुई है। अब सही समय है कि लोग इन संस्थानों पर हो रहे सर्जिकल स्ट्राइक के खिलाफ खड़े हों।"

यशवंत सिन्हा ने कहा, "अगर वास्तव में सरकार ने आरबीआई को निर्देश जारी किए हैं तो इसके गर्वनर को तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए।"

क्या है धारा 7 : 

आरबीआई अधिनियम 1934 की धारा 7 सरकार को जनहित के मुद्दों पर बैंक के गर्वनर के साथ परामर्श के बाद आरबीआई को निर्देश जारी करने का अधिकार देती है। आरबीआई इसे मानने इनकार नहीं कर सकता। 

सरकार-आरबीआई टकराव की मुख्य वजहें :

मुख्य ब्याज दर : मुख्य ब्याज दर के मुद्दे पर सरकार और आरबीआई के संबंधों में कड़वाहट आई। बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के नेतृत्व वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने दरों पर फैसला लेने से पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन से मुलाकात करने से मना कर दिया था।

लाभांश भुगतान : आरबीआई ने 66 हजार करोड़ की जगह मात्र 30 हजार करोड़ रुपये के लाभांश के भुगतान किया। इसके चलते केंद्रीय वित्त मंत्री को केंद्रीय बैंक से और भुगतान की मांग करनी पड़ी, लेकिन उसने ऐसा करने से मना कर दिया। 

नचिकेत मोर का हटाया जाना : नचिकेत मोर को उनका कार्यकाल खत्म होने से पहले ही बिना सूचना दिए आरबीआई के बोर्ड से हटा दिया गया। मोर पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की पसंद थे।

मोर सरकार द्वारा मांगे गए अधिक लाभांश का खुलकर विरोध कर रहे थे। इसके अलावा सरकार पर बोर्ड में अपने पसंदीदा लोगों आरएसएस से जुड़े एस. गुरुमूर्ति और सतीश मराठे को रखने का आरोप लगाया गया। 

ऋण पुनर्व्यवस्था : आरबीआई ने तमाम ऋण पुनर्व्यवस्था (लोन रिस्ट्रक्चरिंग) योजनाओं को बंद कर दिया और बैंकों से सभी संभावित नुकसान के लिए फंड (प्रोविजनिंग) अलग करने को कहा। सरकार तथा बैंकों ने आरबीआई के इस कदम का विरोध करते हुए इसे अव्यवहार्य बताया। 

सरकारी बैंकों का नियमन : नीरव मोदी पीएनबी घोटाले को पकड़ने में नाकाम रहने के लिए आरबीआई को सरकार की कड़ी आलोचना सुननी पड़ी। इसके बाद आरबीआई गवर्नर ने आरोप लगाया कि सरकारी बैंकों के नियमन के लिए सरकार उसे शक्तियां नहीं दे रही। जबकि वित्त मंत्रालय ने कहा कि आरबीआई के पास इसके लिए पर्याप्त शक्तियां थीं। 

तेल कंपनियों के लिए विशेष डॉलर विंडो : तेल कंपनियों की विदेशी मुद्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए आरबीआई ने विशेष डॉलर विंडो खोलने से मना कर दिया। इसके बाद सरकार को कंपनियों को विदेश से कर्ज लेने की मंजूरी देने को मजबूर होना पड़ा। 
 

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