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राजनीति


रावण की रिहाई का दांव भविष्य में भाजपा को भारी भी पड़ सकता है

रावण की समय पूर्व रिहाई इसी नीति के तहत है। यह न सिर्फ दलित बल्कि एससीएसटी को भी लुभाने का सबब बन सकती है. लोकसभा की 28 फीसदी यानी 150 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का दबदबा है। 2011 के जनगणना के हिसाब से देश में अनुसूचित जाति 16.63 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की तादाद 8.6 फीसदी है


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रावण की रिहाई तय समय से पहले हो गई है। पिछले दिनों भाजपा भाजपा कार्यकारिणी के दौरान ही इस बात के संकेत मिल गये थे। सवर्णों की क्षणिक नाराजगी की कीमत पर भी ऐसा कुछ किया जा सकता है, इसका आभास था। रावण ही नहीं सहारनपुर मामले में उनके साथ निरुद्ध सभी को एक एक कर छोड़ दिया गया है।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पहले इस मामले में ज़बरदस्त सख्ती और अब अचानक दिखायी गयी यह दयानतदारी कई सवालों का सबब बन रही है। वह चाहती तो रासुका की अवधि दो महीने बाद तीन महीने के लिये और बढ़ा सकती थी, लेकिन बजाये बढ़ाने के उसने समय में कटौती ही कर दी।

जब 15 महीने पहले रावण की गिरफ्तारी के बाद उनके समर्थकों के अलावा तमाम दूसरे नेता कर रहे थे, तब सरकार ने किसे की न सुनी और अब पुलिस ने कहा कि, “उनकी माता का प्रत्यावेदन और वर्तमान परिस्थितियों के दृष्टिगत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सहानुभूतिपूर्वक विचारोपरांत रावण की समयपूर्व रिहाई करने का निर्णय लिया गया है।”

उधर रावण का आरोप है कि सरकार डरी हुयी है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट से उसे एक याचिका पर झिड़की मिलने वाली थी। इसलिये सरकार ने शर्मिंदगी से बचने क लिये बाध्य हो कर उसे छोड़ दिया। उत्तर प्रदेश सरकार इतनी शर्मीली कभी नहीं रही कि सुप्रीम कोर्ट की झिड़की की फिक्र करे।

अब सवाल यह उठता है कि वे कौन सी वर्तमान परिस्थितियां है, जिनपर सरकार ने विचार किया और उसके बाद उसे लगा कि रावण को आनन फानन में रिहा करना बहुत आवश्यक है।

यदि सरकार के स्तर पर इस मामले को सोचा समझा गया है तो बेशक यह फैसला सियासी है। इस सियासी गुणा गणित के बाद किये गये फैसले में न सिर्फ राज्य सरकार बल्कि केंद्र सरकार की भी सहभागिता है।

सरकार दो ही स्थितियों में ऐसा फैसला ले सकती है एक तो उसे कोई नजदीकी अथवा दूरगामी सियासी फायदा दिखे अथवा कोई दबाव या मज़बूरी हो। सरकार अगर मजबूरी में भी कोई काम करेगी तो उसकी हर संभव प्रयास लाभ का ही होगा। अलग तथ्य है कि फिलहाल उसका यह फैसला उसके लिये बैक फायर करता हुआ लगता है।

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव बस तीन महीने दूर हैं। इसके बाद आम चुनाव हैं। भाजपा के लिये 2014 में संघ ने दलितों को मजबूती से जोड़ा था जो बीते दो तीन बरस में दरक गये और इस साल तो जो भी दलित समर्थन भाजपा के पास था वह भी टूट रहा है, तिस पर सवर्ण भी साथ छोड़ने का मन बना रहे हैं।

ऐसे में दुतरफा नुकसान सहने की बजाये बेहतर यह समझा गया कि सवर्णों की सामयिक और क्षणिक नाराजगी की कीमत पर दलित मतदाताओं को साध लिया जाये, सवर्ण तो पार्टी के उसी प्रकार बंधुआ वोट बैंक हैं, कहां जायेंगे। विकल्पहीन हैं, बाद में मना लिया जायेगा।

सो भाजपा की कार्यकारिणी में कार्यकर्ताओं को यह बता दिया गया कि भले ही सवर्ण विरोध पर उतारू हों, एससीएसटी बिल में संशोधन को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश किया जाये और प्रचारित किया जाये कि और पार्टियां भले ही दम भरती रहें पर दलितों की सबसे हितैषी भाजपा ही है।

रावण की समय पूर्व रिहाई इसी नीति के तहत है। यह न सिर्फ दलित बल्कि एससीएसटी को भी लुभाने का सबब बन सकती है. लोकसभा की 28 फीसदी यानी 150 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का दबदबा है। 2011 के जनगणना के हिसाब से देश में अनुसूचित जाति 16.63 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की तादाद 8.6 फीसदी है।

इन दोनों को मिला दें तो आंकड़ा 25 फीसदी से अधिक होता है। देश के 47,000 गांवों में आधी आबादी दलित है तो 76,000 गांवों में उनकी संख्या 40 फीसदी से ज्यादा है।

लोकसभा की 131 सीटें ईससीएससटी के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में रावण को जेल में रखकर आम चुनावों तक भाजपा दलितों, एससी एसटी की नाराजगी को बनाये नहीं रख सकती।

रावण की राजनीतिक महत्ता महज पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। पश्चिम यूपी में दलितों में मजबूत पकड़ रखनेवाले चंद्रशेखर की भीम आर्मी अब 24 राज्यों में दखल रखती है। सोशल मीडिया पर भी यह बड़े पैमाने पर सक्रिय हैं। जाहिर है युवाओं में भी पकड़ है।

भाजपा को चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण की रिहाई से दलित मतदाताओं का भारी समर्थन हासिल होगा ऐसा कतई नहीं। न ही दलित और एससी-एससटी इस रिहाई से भाजपा पर रीझ जायेंगे। दलित वोट बैंक को प्रभवित करने अनुसूचित जातियों का भरोसा जीने की दिशा में चंद्रशेखर की रिहाई उसके अनुसार बड़ा कदम है।

इस कदम से भाजपा कि मुराद महज इतनी है कि इसके चलते तात्कालिक तौर पर यह माहौल बनेगा कि भाजपा दलितों के भावनाओं का ख्याल रखती है, दलित युवाओं में भी सकारात्मक संकेत जायेगा, दूरगामी तौर पर यह कि अगर भाजपा रावण को अपने हक में मना लेती है अथवा अलग चुनाव लड़ने पर राजी कर लेती है या फिर किसी अन्य तरह के दबाव डाल कर उनका सियासी इस्तेमाल कर पाती है तो यह उसके लिये बेहतर राजनीतिक दांव साबित होगा।

भाजपा की सोच है कि आजाद जितना भाजपा के लिये खतरा नहीं होगा, उतना गठबंधन के लिये या गठबंधन न बन पाने पर बसपा के लिये खतरनाक होगा। बीजेपी चंद्रशेखर का रणनीतिक और राजनीतिक इस्तेमाल मायावती के खिलाफ कर सकती है। पर क्या यह इतना आसान है।

रावण भारी मांग में है। भीम आर्मी का गठन होने के बाद से ही पश्चिम यूपी में बीएसपी प्रमुख उससे खतरा महसूस करती रहीं, पर इसके बावजूद सियासत की यह मांग थी कि वह न सिर्फ उनकी रिहाई की मांग करती रहीं बल्कि कई बार छिपे अर्थों में बसपा के साथ आने को भी कहा, मंडलीय सम्मेलन में पार्टी के नेताओं ने भी आजाद से बहनजी के साथ आने की अपील की थी।

बरसों तक दलित काग्रेस का भी कोर वोट बैंक रहा है, उसने भी जिग्नेश मेवाणी के जरिये चंद्रशेखर को साधने की कई कोशिशें अंजाम दे चुकी है। जिग्नेश ने अपने और चंद्रशेखर को मायावती का दाया और बायां हाथ कहा, तो जाहिर है सपा को भी चिंता होनी ही थी। अखिलेश यादव ने भी लगे हाथ रावण पर डोरे डाल दिये।

यह भी कोशिशें काफी तेज रहीं कि महागठबंधन में भीम आर्मी को भी शामिल रखा जाये। सबब यह कि आजाद सबके लिये जरुरी और सबके लिये मजबूरी है। खास तौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, पश्चिमी उत्तर प्रदेश सूबे में दलित राजनीति  की नर्सरी रही, बसपा की पैदाइश वहीं से हुयी और अब उसी जमीन से भीम आर्मी सरीखा दलित संगठन खड़ा होना बसपा के लिए सोच का सबब है।

भीम आर्मी काफी आक्रामक संगठन है, यह बात भी बसपा के लिये बहुत चुनौती पूर्ण है खास तौर पर तब जबकि पिछले लगातार तीन चुनाव बसपा के लिए अच्छे नहीं गुजरे हैं। 2014  के आम चुनाव में वो अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी। युवा दलित मतदाता विभ्रम वाली स्थिति में है।

भाजपा, बसपा की इस असफलता को अपने हक में भुनाने की कोशिश कर सकती है। इसीलिये दलित वोट बीजेपी के एजेंडे में प्रमुख है। 200 करोड़ की लागत से बने अंबेडकर स्मारक का उद्घाटन से लेकर और कई दूसरी कवायद सरकार इस दिशा में कर चुकी है।

फिलहाल आम चुनाव दूर हैं, देश की बात बाद में अभी तत्काल तो यह रिहाई पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी समीकरण को बदलेगी। हो सकता है, गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रवेश करें। यह रावण पर निर्भर करेगा कि वह अपनी राजनीतिक रणनीति के तहत क्या कदम उठाते हैं।

रावण ने हमेशा ही यह कहा है कि वे 2019 का चुनाव नहीं लड़ेंगे, उन्हें पता है कि वे बिना जंग के कामयाब हैं। वे समूचे विपक्ष के लिये महत्वपूर्ण हैं तो भाजपा के लिये भी। रावण के अनुसार बीजेपी को 2019 में हराना ही उनका सबसे बड़ा लक्ष्य है। फिलहाल मायावती के प्रति वे नरम हैं और महागठबंधन में शामिल होने के हामी।

पर क्या महागठबंधन बनेगा। सीबीआई से सहमी हुई माया और उनके रुख से ठिठके हुये अखिलेश साथ आयेंगे। क्या मायावती आपनी पार्टी या वोटबैंक और सूबे में दो ध्रुव बनने देंगी। क्या भाजपा साम, दाम, दंड, भेद के पैंतरे अपना कर इस मिसाइल की दिशा मोड़ने की कोशिश छोड़ देगी। क्या रावण अपने कहे पर अडिग रहेंगे, किसी व्यक्ति, संस्था के बाहरी दबाव में नहीं झुकेंगे।

फिलहाल रिहाई के बाद रावण ने अपने पत्ते बंद रखे हैं,  उनकी रणनीति क्या होगी किसी को नहीं पता। रिहाई के बाद ये सारे सवालात और उनके जवाब मायने रखते हैं। जैसे जैसे इनके उत्तर मिलते जायेंगे, राजनीतिक परिस्थितियां और इस रिहाई के राज सामने आते जायेंगे और साथ ही इसके फलितार्थ भी।

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