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संपादकीय


शून्य दुर्घटना का संकल्प लेने वाली सरकार के शासन काल में इसकी भरमार क्यों है

प्रबंधन के लिए रेलवे अधिकारियों की बढ़ोतरी कई गुना हुई पर परिचालन के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों की संख्या लगभग आधी हो गई। स्टेशन मास्टर को प्रथमदृष्टया दोषी मानने के बावजूद हमेशा की तरह इस दुर्घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। सर्वविदित है आगे क्या होगा


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एक और बड़ी रेल दुर्घटना। 9 डिब्बे पटरी से उतरे, सात मरे और बहुत से घायल। देश में भीषण रेल दुर्घटनाओं का सुदीर्घ इतिहास है।

हो सकता है जानमाल की दृष्टि से यह दुर्घटना बहुत बड़ी न लगे पर घायल या मौतों की संख्या कम होने जाने से फरक्का मेल की इस रेल दुर्घटना को कम कर के नहीं आंका जा सकता।

शून्य दुर्घटना का संकल्प लेने वाली रेलवे की हालत यह है कि 2016 के नवंबर से अब तक कई रेल दुर्घटनायें हो चुकी हैं। जिन दुर्घटनाओं में जान नहीं जाती उनका जिक्र तक नहीं होता।

सबब यह कि देश में आये दिन रेल दुर्घटनायें होती ही रहती हैं जिनमें जान का नुकसान कम या माल का ज्यादा नहीं होता, वे सुर्खियों का सबब नहीं बन पातीं पर छोटी ही सही, वे भी दुर्घटनाओं में ही गिनी जानी चाहिए, उसके लिए भी रेलवे का प्रबंधन, तकनीकी खामी अथवा व्यवस्था ही दोषी होती है। 

दो बरस पहले रेलवे में संरक्षा और सुरक्षा पर संसद की स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि रेल परिचालन में सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा रहा है, वह रेल मंत्रालय के इस तर्क से संतुष्ट नहीं है। उसने चेताया कि मंत्रालय सुरक्षा की गंभीरता को समझे।

डिब्बों के टकराने, पटरी से उतरने, रेलगाड़ी में आग लगने और समपार आदि पर हुई 100 से अधिक रेल दुर्घटनाओं में रेलवे की कोई न कोई चूक शामिल थी जिससे बचा जा सकता था।

सच बात तो यह है कि सब इच्छाशक्ति और निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन की कमी और प्रचार की अतिशय भूख के साथ कुप्रबंधन को ढंकने का नतीजा है।

रेलवे यदि अपनी सभी पुरानी दुर्घटनाओं की ईमानदार जांच करें, वह केवल तकनीक, मशीनों, छोटे कर्मचारियों पर थोपने और उसकी रिपोर्ट संबंधित महकमे को बचाने के लिए महज लीपापोती के लिए न हों तो हर तरह की खामियां सामने आ सकती हैं।

देश में छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनायें बहुतायत में होती हैं, इसकी ईमानदार जांच तकनीक और व्यवस्था में एक से एक बारीक खामी को पकड़ सकती है। बड़ी रेल दुर्घटनाओं की वजहें दर्जन भर से ज्यादा नहीं हैं। 

इनको दूर करने पर ध्यान केंद्रित कर कुशलतापूर्वक कार्य किया जाए तो मंत्रालय शून्य दुर्घटना के लक्ष्य के करीब पहुंच भी सकता है। पर इतना कौन कहे रेलवे तो अपने रुटीन और मूलभूत काम भी नियमित नहीं करता।

हर दस साल पर रेल की पटरी बदलनी चाहिए। क्या इस लक्ष्य पर काम होता है। सात दशकों में पटरियां खूब बिछीं, नेताओं की मांग पर ट्रेनें कई चलीं। 

इनके प्रबंधन के लिए रेलवे अधिकारियों की बढ़ोतरी कई गुना हुई पर परिचालन के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों की संख्या लगभग आधी हो गई। स्टेशन मास्टर को प्रथमदृष्टया दोषी मानने के बावजूद हमेशा की तरह इस दुर्घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। सर्वविदित है आगे क्या होगा।

विगत दुर्घटनाओं की जांच का क्या हुआ? जांच की घोषणा महज रस्म अदायगी है। रेल मंत्रालय हमेशा जनता की जेब पर नजर गड़ाए रखने और प्रचार पिपासु होने की बजाय अपनी आधारभूत संरचना, कर्मचारियों की संख्या, संरक्षा-सुरक्षा पर ध्यान दे, तो दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।

पर मंत्री बदलने मात्र से व्यवस्था तो नहीं बदलती। सवाल यह है कि शून्य दुर्घटना का संकल्प लेने वाली सरकार के शासन काल में इसकी भरमार क्यों है?

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