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राजनीति


आर्थिक आधार पर आरक्षण का कॉन्सेप्ट क्या सामाजिक न्याय के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता है!

एक झटके में सरकार ने सामाजिक न्याय और आरक्षण की अवधारणा को ही विकृत कर दिया। आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोई भी गुंजाइश हमारे संविधान की भावना में शामिल नहीं है। यह जानने के लिए संविधान सभा में हुई बहसों को देखना चाहिए


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संसद ने आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दस प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान के 124वें संशोधन को पारित कर दिया है। अब यह विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद लागू हो जाएगा।

संसद के दोनों सदनों में इस बिल को लेकर जो चर्चा हुई, उसने संविधान की भावना और सामाजिक न्याय के सिद्धान्त के प्रति राजनीतिक दलों और सांसदों की प्रतिबद्धता को लेकर घोर निराशा पैदा की है। हालांकि मनोज झा और असद्दुदीन ओवैसी जैसे सांसदों ने ज़रूर तथ्यात्मक ढंग से बिल का विरोध किया, लेकिन बड़ी पार्टियों ने विरोध की हिम्मत नहीं दिखाई।

दरअस्ल, इस वक़्त देश की राजनीति पर वोटबैंक का प्रभाव इतना हावी हो चुका है कि संवैधानिक नैतिकता और वाज़िब सामाजिक न्याय का पक्ष लेने की हिम्मत बहुत कम लोगों में बची है। वैसे तो मोदी सरकार का यह अप्रत्याशित क़दम साफ़ तौर पर राजनीति से प्रेरित लगता है, लेकिन इसके प्रभाव दूरगामी होंगे।

एक झटके में सरकार ने सामाजिक न्याय और आरक्षण की अवधारणा को ही विकृत कर दिया। आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोई भी गुंजाइश हमारे संविधान की भावना में शामिल नहीं है। यह जानने के लिए संविधान सभा में हुई बहसों को देखना चाहिए।

इसका एक और प्रमाण संविधान के पहले संशोधन की प्रक्रिया में दिखता है। चम्पाकम दौरैराजन बनाम मद्रास राज्य (1951) के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से उपजे भ्रम को दूर करने के लिए संसद ने पहला संविधान संशोधन (1951) पारित किया।

इस संशोधन के ज़रिए संविधान के अनुच्छेद 15 में उपखण्ड (4) जोड़ा गया। इस उपखण्ड में कहा गया कि राज्य सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए विशेष क़दम उठा सकता है। जब यह संविधान संशोधन पारित किया जा रहा था, तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक अमेंडमेंट मोशन देकर आर्टिकल 15 (4)  की शब्दावली में सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के साथ आर्थिक पिछड़ेपन को भी जोड़ने की बात की।

मुखर्जी का यह संशोधन प्रस्ताव 5 के मुक़ाबले 252 मतों से गिर गया। गौरतलब है कि उस वक्त तक पहला आम चुनाव नहीं हुआ था और संविधान सभा को ही अस्थायी संसद में तब्दील कर दिया गया था।

इससे पता चलता है कि हमारे संविधान निर्माता लगभग एकमत से आर्थिक आधार पर रिज़र्वेशन देने के ख़िलाफ़ थे। आरक्षण असल में प्रतिनिधित्व का सवाल है। यह ग़रीबी उन्मूलन का कोई कार्यक्रम नहीं है। सरकार ने आर्थिक आधार पर रिज़र्वेशन देने की क़वायद कर इसे ग़रीबी दूर करने वाली किसी योजना के समकक्ष ला खड़ा किया है।

दरअस्ल, आरक्षण की नीति के विपक्ष में अब तक दिए जाते रहे पारम्परिक तर्कों में से एक प्रमुख तर्क यह था कि इतने लंबे समय तक आरक्षण का लाभ लेने के बावजूद एससी या एसटी वर्ग की ग़रीबी दूर क्यों नहीं हुई। यह तर्क आरक्षण की नीति को लेकर उसी विकृत समझ पर आधारित है, जिसके तहत यह सरकार आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के लिए आरक्षण का प्रावधान ले आयी है।

आरक्षण का उद्देश्य यह कतई नहीं है कि इससे किसी वर्ग का आर्थिक उत्थान होगा। यह उद्देश्य इसलिए भी अव्यवहारिक हो जाएगा कि किसी भी वर्ग की आबादी में हिस्सेदारी की तुलना भी सरकारी नौकरियों की संख्या बहुत सीमित है।

ज़ाहिर है कि किसी वर्ग विशेष के मुठ्ठीभर लोगों को नौकरी मिल जाने से उस वर्ग का व्यापक आर्थिक उत्थान सम्भव नहीं है। आरक्षण सामाजिक न्याय की अवधारणा के तहत सदियों से पीड़ित और वंचित लोगों को नीति निर्माण में उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए लाया गया था।

ऐसा करना इसलिए आवश्यक था कि जो लोग एक लंबे समय से शिक्षा आदि से वंचित थे, वे अचानक से सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर सशक्त रहे लोगों का मुकाबला नहीं कर पाते। इसकी ज़रूरत तब भी थी और आज भी है।

आज यदि सरकार यह कह रही है कि वह इसे ग़रीबों को देगी, तो इसके मायने बदल जाते हैं। यदि यह ग़रीबों को मिलेगा, तो उन सब लोगों को मिलना चाहिए, जो इसके पात्र हैं। ज़ाहिर है कि ऐसा करना संभव नहीं है।

यदि आरक्षण का लाभ मुट्ठी भर सरकार द्वारा परिभाषित ग़रीबों को ही मिलेगा और अधिकांश लोग इससे छूट जाएंगे, तो इसके उद्देश्य पर ही गम्भीर प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं। यदि सरकार अब भी यही कहेगी कि यह नवीन आरक्षण प्रतिनिधित्व के लिए लाया गया है, तब भी इसकी सार्थकता सिद्ध नहीं की जा सकती है।

कारण है कि सवर्ण जातियों का नीति निर्माण में प्रतिनिधित्व उनकी आबादी में हिस्सेदारी की तुलना में पहले से ही बहुत अधिक है। दरअस्ल, आरक्षण व्यक्ति को नहीं बल्कि वर्ग को देने की अवधारणा है।

सिद्धान्त यह है कि यदि किसी वर्ग के कुछ प्रतिशत लोग प्रशासन के विभिन्न पदों पर आसीन हो जाएंगे, तो उस वर्ग को नीति निर्माण में प्रतिनिधित्व हासिल हो जाएगा। ऐसा हो जाने पर उस वर्ग के हितों की भी रक्षा हो पाएगी। अब सरकार रिज़र्वेशन को ग़रीबों के लिए लाकर उसे वर्ग के बजाय व्यक्तियों को दे रही है।

ऐसा सम्भव नहीं है कि कुछ ग़रीबों को आरक्षण के माध्यम से प्रशासन का हिस्सा बनाकर उन्हें ग़रीब वर्ग का प्रतिनिधि मान लिया जाय। नौकरी मिल जाने वाले व्यक्ति की ग़रीबी दूर हो जाएगी और वह निर्धन वर्ग का प्रतिनिधि नहीं रहेगा। लेकिन एक दलित को नौकरी मिल जाने पर भी उसकी जाति नहीं बदलती है और वह दलितों का प्रतिनिधित्व करता रहता है।

अतः साफ़ है कि केवल निर्धन लोगों को रिज़र्वेशन देने का उपक्रम आरक्षण की नीति में वर्ग के बजाय व्यक्ति को इकाई बना देता है। अब सवाल यह उठता है कि एक निर्धन व्यक्ति को इस नीति का लाभ मिलेगा और दूसरे को नहीं मिलेगा, तो क्या यह समानता के सिद्धान्त पर कुठाराघात नहीं है?

सरकार कोई ऐसी आर्थिक योजना नहीं चला सकती है, जिसका फ़ायदा केवल कुछ पात्र लोगों को मिले और बाक़ी पात्र उसके लाभ से वंचित रह जाएं। अतः निष्कर्ष यही निकलता है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण का कॉन्सेप्ट सामाजिक न्याय के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता है।

यह न तो प्रतिनिधित्व का सवाल रह पाएगा और न ही निर्धनता दूर करने वाला कोई कार्यक्रम बन पाएगा। संसद से पारित हो जाने के बाद अब इस विधेयक को न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना होगा। उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय इसके सभी पहलुओं पर गौर करेगा।

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