ममता की महारैली में पूर्व PM से लेकर जुटे कई पूर्व मुख्यमंत्री PHOTOS - Lok Sabha Election 2019 AajTak - आज तक     |       vinayak sharad and suspected woman arrested in bhaiyyu maharaj suicide case - दैनिक जागरण (Dainik Jagran)     |       Gaganyaan: Crew module, crew service module design to be finalised soon - Times Now     |       21 जनवरी को लगेगा साल का पहला चंद्रग्रहण, जानें कितने बजे होगा शुरू और कब लगेगा सूतक - Hindustan हिंदी     |       केन्द्र सरकार को नहीं पता, 1990 के कत्लेआम में मारे गए कितने कश्मीरी पंडित - आज तक     |       Grahan 2019/ इस साल पड़ेंगे कुल 5 ग्रहण, 2 चंद्रग्रहण और 3 सूर्यग्रहण से बदलेगी दशा, जानें कब-कब होंगे ग्रहण? - Dainik Bhaskar     |       सबरीमाला/ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 10-50 उम्र की 51 महिलाओं ने दर्शन किए- केरल सरकार - Dainik Bhaskar     |       पौष पूर्णिमा 2019/जानें कब से कब तक रहेगी पूर्णिमा, क्या रहेगा स्नान, पूजन और दान-दक्षिणा का शुभ समय - Dainik Bhaskar     |       Two Russian fighter jets collide over Sea of Japan - Times Now     |       ट्रंप-किम की दूसरी मुलाकात 'जल्द' होगी - BBC हिंदी     |       हादसा/ जापानी समुद्र के ऊपर अभ्यास के दौरान दो रूसी फाइटर जेट टकराए, पायलट सुरक्षित - Dainik Bhaskar     |       यूके/ ब्रेग्जिट डील फेल होने के बाद संसद में थेरेसा मे अविश्वास प्रस्ताव में जीतीं, 19 वोटों से बचाई सरकार - Dainik Bhaskar     |       उठा-पटक के बीच बाजार की सपाट क्लोजिंग - मनी कॉंट्रोल     |       शनिवार को पेट्रोल-डीजल के दाम में हुई भारी बढ़ोतरी, फटाफट जानिए नए रेट्स - News18 Hindi     |       Market Today Fatafat ET Now: Sensex, Nifty end flat, RIL shares log 4%-gain; top 10 stocks in news - Times Now     |       तस्वीरों में देखें Toyota Camry Hybrid 2019 कार, भारत में हुई लॉन्च- Amarujala - अमर उजाला     |       मणिकर्ण‍िका की स्पेशल स्क्रीनिंग, राष्ट्रपति ने देखी फिल्म - आज तक     |       विवाद/ बोनी कपूर का एलान जब तक बंद नहीं हो जाती फिल्म श्रीदेवी बंगलो, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे - Dainik Bhaskar     |       भाबी जी घर पर हैं की अनीता भाभी के घर आया नया मेहमान, गोरी मेम बनीं मां - दैनिक जागरण (Dainik Jagran)     |       URI Box Office Collection Day 8: विक्की कौशल की 'उरी' ने 'बधाई हो' को छोड़ा पीछे, कमाई में बना डाला ये रिकॉर्ड - NDTV India     |       MS Dhoni on cusp of achieving new milestone in 3rd ODI against Australia at MCG - Times Now     |       Malaysia Masters: Saina Nehwal beats Nozomi Okuhara in quarters, to take on Carolina Marin in semi-finals - Times Now     |       ऑस्ट्रेलिया में चली चहल की फिरकी, शास्त्री-मुश्ताक के रिकॉर्ड टूटे - Sports - आज तक     |       Jose Mourinho: Ex-Man United manager 'too young to retire' and 'belongs at top level' - Myjoyonline.com     |      

राष्ट्रीय


#MeToo | मी_टू अभियान एक आधुनिक और सभ्य समाज के तौर पर क्या हमें बेहतर बनाएगा?

हिन्दुस्तान, ख़ासकर हिंदी पट्टी के पितृ प्रधान समाज ने हमेशा से लड़कियों और महिलाओं की कल्पना शर्मो-हया के आवरण में लिपटी हुई एक स्त्री के तौर पर पेश की है। इस सोच का एक सिरा पारम्परिक संस्कारों को छूता है, तो दूसरा सिरा यौन उत्पीड़न जैसी घटनाओं तक पहुँचता है


will-the-me-too-campaign-make-us-better-as-a-modern-and-civilized-society

आपने अमिताभ बच्चन की पिंक फ़िल्म ज़रूर देखी होगी। फ़िल्म के अंत में जब जज अपना फ़ैसला सुनाने के ठीक पहले पीड़ित लड़कियों के वक़ील अमिताभ बच्चन से अपनी आख़िरी दलील पेश करने को कहता है, तो अमिताभ अपनी बात 'नो' यानी 'ना' से शुरू करते हैं। वे कहते हैं कि 'ना' का मतलब सिर्फ़ 'ना' ही होता है।

एक ओर तो यह आदर्श सोच है कि किसी महिला की 'ना' का मतलब उसकी ओर से आख़िर असहमति ही होती है, दूसरी ओर हमें यह सिखाया गया है कि लड़की की 'ना' में ही दरअस्ल, 'हाँ' छिपी होती है। 

'हँसी तो फ़ँसी' के तर्ज पर प्रेम कहानियाँ सुनते और अपने आसपास देखते आ रहे हमारे मस्तिष्क को समान्यतया यह स्वीकार करने में बहुत कठिनाई होती है कि एक महिला की 'ना', उसके पूरे अस्तित्व व गरिमापूर्ण जीवन के लिए बहुत मायने रखती है। 

इस देश की हिंदी पट्टी में एक प्रसिद्ध कहावत है- 'जैसा खाये अन्न, वैसा रहे मन।' यहाँ अन्न से हमारा आशय अपने आसपास के माहौल, संस्कारों और परिस्थितियों से है। 

हिन्दुस्तान, ख़ासकर हिंदी पट्टी के पितृ प्रधान समाज ने हमेशा से लड़कियों और महिलाओं की कल्पना शर्मो-हया के आवरण में लिपटी हुई एक स्त्री के तौर पर पेश की है। इस सोच का एक सिरा पारम्परिक संस्कारों को छूता है, तो दूसरा सिरा यौन उत्पीड़न जैसी घटनाओं तक पहुँचता है। 

इस समाज ने स्त्री की कल्पना हमेशा से इस रूप में की है कि वह कभी खुलकर अपने मनोभावों को व्यक्त नहीं कर सकती है। 

इसी सोच का नतीज़ा है कि जब एक महिला किसी मर्द के प्रेम प्रस्तावों या हरकतों पर 'ना' कहती है या नक़ारात्मक प्रतिक्रिया दिखाती है, तो पुरुष इसे उसकी अंतिम असहमति नहीं समझ पाता है। 

इसी मनोवृति के तहत यौन शोषण की बहुआयामी प्रक्रिया की शुरूआत होती है, जो रोमांटिक (और कई बार अश्लील) मैसेज करने, अनचाहे गिफ़्ट देने से लेकर बदन को छूने और गंदे इशारे करने तक चली जाती है। 

इस मानसिकता को विकसित और पोषित करने में बॉलीवुड फ़िल्मों का भी कम योगदान नहीं है। जहाँ पिंक जैसी 21वीं सदी के दूसरे दशक की एक प्रगतिशील फ़िल्म ने 'ना' के महत्व को समझाया है, तो बीती सदी के अंतिम दशक की दर्ज़नों फ़िल्मों ने 'ना में ही हाँ है' के मिथक को स्थापित भी किया है। 

इस धीमे, घुटन भरे और भयावह उत्पीड़न व शोषण के प्रतिरोध की दर इतनी धीमी है कि मर्द इसे अपना हक़ समझ बैठे हैं और बिना किसी डर या हिचक के वे ऐसा करते हैं। ऐसे सामाजिक परिवेश और परिस्थितियों में भारत में मी_टू कैंपेन का पदार्पण बेहद दिलचस्प और पेंचीदा है। 

हमें इस कैंपेन पर आ रही प्रतिक्रियाओं की तुलना उन समाजों में हुई प्रतिक्रियाओं से करनी होगी, जहाँ इस कैंपेन की शुरुआत हुई थी और उससे निष्कर्ष निकालने होंगे। तभी एक समाज के तौर पर मी_टू अभियान का हम महिला सशक्तिकरण में प्रयोग कर सकेंगे। 

पिछले साल अमरीकी अभिनेत्री रोज़ मैकगोवान ने हॉलीवुड के चर्चित प्रोड्यूसर हार्वी वाइनस्टीन पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। उसके बाद कई हॉलीवुड अभिनेत्रियों और कामक़ाजी महिलाओं ने #Me_Too के साथ सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा करने शुरू किये। इसके बाद पश्चिमी जगत में मी_टू अभियान ज़ोर पकड़ता गया। 

इसके लपेटे में कई हॉलीवुड हस्तियाँ, पत्रकार और राजनेता आये। कईयों को अपना पद और रसूख़ गंवाना पड़ा। पश्चिमी जगत में मी_टू के संदर्भ में एक सकारात्मक बात यह रही है कि इसे लेकर समाज, ख़ासकर पुरुष वर्ग में बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। 

मर्दों ने इस कैंपेन का भरपूर समर्थन भी किया है। वहाँ पीड़ित महिलाओं पर ही उल्टे सवाल उठा देने की घटनाएं बहुत कम हुई हैं। भारत में स्थिति वैसी नहीं है। 

यहाँ अब तक कई फ़िल्मी हस्तियों, एक प्रतिष्ठित लेखक और पत्रकार से राजनेता बने एक केन्द्रीय मंत्री पर इस अभियान के तहत यौन शोषण के आरोप लग चुके हैं। 

निराश और हताश करने वाली बात यह है कि अब तक इन लोगों का बहिष्कार होना तो दूर की बात है, अधिकतर लोग इन आरोपों पर मुँह खोलने को भी तैयार नहीं हैं। उल्टे इस चीज़ को लेकर सवाल किये जा रहे हैं कि इतने वर्ष बाद किसी पर आरोप लगाने का क्या तुक है। 

दरअस्ल, यहाँ हम एक समाज के तौर पर महिलाओं की हिम्मत बढ़ाने में चूक करके गंभीर ग़लती कर रहे हैं। हालाँकि यहाँ इस अभियान के पक्ष में मुखर होने वाले लोग भी हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं है। पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग, ख़ासकर मध्यवर्गीय पुरुष इस अभियान का कतई वांछित समर्थन नहीं कर रहा है। 

मीडिया का भी एक बड़ा हिस्सा इन संगीन आरोपों पर रिपोर्टिंग करने की खानापूर्ति ही करता नज़र आ रहा है। देश में होने वाली बलात्कार की घटनाओं पर हमारा मीडिया जिस तरह आक्रामक हो जाता है, वैसा जोश इन आरोपों को लेकर कहीं दिखलाई नहीं पड़ रहा है। 

क्या ऐसा इसलिए है कि आरोपों के दायरे में बड़ी व प्रतिष्ठित हस्तियाँ हैं? या ऐसा इसलिए हो रहा है कि हमारा समाज बलात्कार को बहुत बड़ी घटना  और छेड़छाड़ को बहुत छोटी व मामूली घटना मानता है? 

क्या महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों को लेकर हमारी संवेदना तभी जागती है, जब किसी बच्ची या औरत के साथ दरिंदगी होती है, उसे खून से लथपथ करके सड़क पर छोड़ दिया जाता है? 

क्या हम यह मान बैठे हैं या मानते रहे हैं कि लड़कियों और औरतों के साथ छेड़खानी होती रहती है, उससे न तो उन महिलाओं को और न इस समाज को कोई फ़र्क पड़ता है? क्या हम अब तक यह सोच और समझ नहीं पाये हैं कि महिलाओं के साथ होने वाली ऐसी छेड़छाड़ की घटनाएं ही उनके साथ होने वाली दरिंदगी की ज़मीन तैयार करती हैं? 

भारत में मी_टू कैंपेन की शुरुआत और उस पर आने वाली प्रतिक्रियाओं ने ऐसे तमाम तीख़े सवाल हमारे सामने खड़े किये हैं। 

अंत में, सबसे निराशाजनक विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर का मंत्री पद पर अब तक बने रहना है, जबकि सबसे ज़्यादा और संगीन आरोप उन पर ही लगे हैं। 

क्या किसी पश्चिमी देश में भी यह संभव था कि यौन उत्पीड़न के इतने गंभीर आरोप लगने के बाद भी कोई व्यक्ति सरकार में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक व संवैधानिक पद पर इतने दिन बना रहे? 

advertisement

  • संबंधित खबरें